Monday, January 20, 2020

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन नौकरी के नाम पे पसीने छूट जाते हैं। यहाँ मीता ने अपनी जिंदगी के दस वर्ष रमेश के घर को सजाने में और उसके परिवार के नाम पे न्यौछावर कर दिए थे। कभी कभी ये सोचकर वह गर्व से झूम उठती थी लेकिन आज जैसे किसी ने उसे अंदर तक हिला कर रख दिया। उसकी जड़ों ने जैसे यकायक उसका साथ ही छोड़ दिया जैसे उसकी साँस दिल और गले के बीच ही कहीं अटक कर रह गई। वह उस समय तो कुछ नहीं कह सकी लेकिन मन ही मन कुछ फैसले ले चुकी थी। अगले दिन सुबह उठते ही साथ उसने रमेश को अपना फैसला सुनाया कि अब वह नौकरी करना चाहती है,सुनकर रमेश अचकचा गया और बोला- यूँ अचानक? मीता आत्मविश्वास से बोली कि हाँ, जीवन के दस वर्ष व्यर्थ कर दिए अब और नहीं। कई कंपनियों में बायो डाटा भेजा था एक जगह से साक्षात्कार के लिए बुलाया है आज ही निकलना है। रमेश को जैसे किसी ने आसमान से धरातल पर पटक दिया हो। एक ही मिनट में उसने सोच लिया कि घर का क्या होगा? बच्चों की देखभाल, परिवार का ख्याल मीता के सिवा कोई नहीं रख सकता। उसने मीता से विनती की कि वो नौकरी न करे , और अपनी कही हुई बात के लिए शर्मिंदा होते हुए माफी माँगी। अब जाके मीता को आराम मिला। मिले भी क्यों न आखिर उसने अपने स्वाभिमान की रक्षा जो कर ली थी।
डॉ. आशु जैन 16/04/19

महावीर

सुखी रहें सब जीव जगत के
ऐसी समता कहाँ से लाऊँ,
हर पाऊँ सबकी बाधाएं
ऐसी क्षमता कहाँ से लाऊँ
सब जीवों पर करूणा बरसे
ऐसी ममता कहाँ से लाऊँ
सत्य अहिंसा हँस के पालूँ
वो प्रसन्नता कहाँ से लाऊँ?
कभी किसी का दिल न दुखाऊँ
वो समानता कहाँ से लाऊँ
ध्यान समाधि में बह जाऊँ
वो गहनता कहाँ से लाऊँ?
पाप कर्म सब नष्ट कर सकूँ
वो पावनता कहाँ से लाऊँ
मैं भी महावीर बन जाऊँ
वो महानता कहाँ से लाऊँ।

डॉ. आशु जैन 17/04/19

आभूषण

न दिन में चैन, न रात में चैना
देखन तोखों तरसें नैना
फिरूं मैं मारी पाऊँ कहीं न
का सखि साजन! न सखि गहना।

हृदय हुआ है बेकल बेकल
दिन रात बहें आँखों से अश्रु जल
मिले जो तू तो बढ़े हृदयबल
का सखि साजन! न सखि पायल।

मिला जो तू तो भूली सोना
जमकर नाची अपने अँगना
रोना छोड़ के सीखी हँसना
का सखि साजन! न सखि कँगना।

नजर लगे न तू है काला
खुशी से मुँह पे जड़ गया ताला
तू है मेरे मय का प्याला
का सखि साजन! न सखि माला।

कमर के चारों ओर तू हरदम
छुए तो लगे कि छिड़ गई सरगम
चलूँ तो बढ़ती सबकी धड़कन
का सखि साजन! न सखि करधन।

डॉ. आशु जैन 

सबसे निराला

वो
सबसे अलग
निराला जगत में
मेरा प्रभु
कन्हैया।

माखनचोर
मटकी फोड़ता
चुराता राधा की
कढाई वाली
चुनरिया।

रचाये
रास लीला
सब गोपियों संग
बनता है
नचैया।

पार
लगाता है
भटकती नाव को
संसार से
खिवैया।

हरता
दुख बाधाएँ
भर देता झोली
मेरा कृष्ण!
हरैया।

डॉ. आशु जैन 30/04/19



तालीम

टूटकर प्यार करने का, ईनाम मिल गया
दिल को एक बेवफा, बेईमान मिल गया।
मिली हमें बेवकूफी की तालीम इस तरह
कि ज़िन्दगी भर रोने का सामान मिल गया।
ख्वाहिशें थीं कि ठंड की सुहानी धूप हो
हमको बादलो से घिरा आसमान मिल गया।
हमने वफ़ा निभाई और जले दोज़ख की आग में
जो बेवफा हुए उन्हें सारा जहान मिल गया।
अब प्यार करने की कभी जुर्रत नहीं करेंगे
वादियों में रास्ता वीरान मिल गया।

डॉ. आशु जैन 03/05/19

मजबूर

किसको बताऊँ कितना मैं मजबूर हो गया हूँ
सुबह से लेकर रात तक मजदूर हो गया हूँ।
चर्चे बड़े हैं मेरे शहर ए तमाम में
कि देखते ही देखते मशहूर हो गया हूँ।
जिनको फ़िकर नहीं थी मेरी पूछते हैं अब
सोचकर इसे मैं मगरूर हो गया हूँ।
आदमी बड़ा नहीं था फ़क़त आदमी ही था
शर्मिंदा थे जो मुझपे उनका ग़ुरूर हो गया हूँ।
सब ओर फैला है जो वो नूर है मेरा
जब खुद में झाँकता हूँ तो बेनूर हो गया हूँ।
डॉ. आशु जैन 01/05/19

तकदीर का खेल

हम
जुदा हुए
तकदीर का खेल
तुमने सोचा
कभी?

वो
था फरेब
प्यार नही था
मैने समझा
अब।

तुमने
हर बार
बहलाया झूठ से
मानती रही
मैं।

अब
ठान लिया
लडूंगी अकेले सब से
रहूँगी साथ
अपने।

डॉ. आशु जैन 30/04/19

अमीर गरीब



जैसे
समुद्र में
मछलियाँ खाती हैं
एक दूसरे
को

वैसे
लीलता है
इस धरा पर
अमीर गरीब
को।

जैसे
करती हैं
कुछ मछलियाँ गन्दगी
तालाब में
रहकर

वैसे
करके हमला
आतंकवादी मानता है
शैतान को
रहबर।

डॉ. आशु जैन 30/04/19

उपाय

मिल न पाय,
कोई उपाय
दिल की लगी
को कैसे बुझाय
अँखियन अँखियन रैना बीते
याद तुम्हारी हमको सताय
तुम्हे न देखे हम मुरझाय
लखियत तुमको मन मुस्काय
हाथ पकड़ लो हम हिल जाय
मिल जाओ तो हम खिल जाय
बहुतई मन को हम समझाय
लाख जतन करे ढूँढे उपाय
कोई उपाय समझ न आय
मन में छटपट बढ़ती जाय
व्याकुल हिय बहुतई घबराए
मिल जाओ तो ठंडक पाय।

डॉ. आशु जैन 08/05/19

तेरा ज़िक्र

ज़िक्र जब जब तेरा मेरी ज़ुबान पे आता है
मेरा तन बदन खिलता है महक सा जाता है।
खुशबू तेरी मेरी बातों से आने लगती है
दिल मेरा जोरों से धड़क सा जाता है।
हम क्यों जुदा हुए कोई जानता नहीं
सोचकर हर बार मेरा मन तड़प सा जाता है।
जब याद आती है वो पहले प्यार की बात
मीठी मुलाकात का शोला भड़क सा जाता है।
क्या तदबीर करूँ कि हो जाए मुलाकात
तुझ तक आने वाला हर रास्ता भटक सा जाता है।
जब चाहूँ तुझे पाना तेरे साथ उम्र बिताना
मेरा ये ख्याल जमाने को खटक सा जाता है।

डॉ. आशु जैन 08/05/19

वो समय

सतयुग से चलते चलते
जो कलयुग में आ पहुंचा है
वो समय ब्रम्ह की वाणी से
गतिमान हुआ न ठहरा है।

वो आगे आगे चलता है
हम छूट कहीं जाते पीछे
बातें बातों में भूल गए
दिल में यादों का पहरा है।

शब्दों के जालों में उलझे
बातों के अर्थ नहीं समझे
उर्दू इंग्लिश सब सीख लिया
पर दिल में बसा ककहरा है।

दिन रात गए सालों गुज़रे
हम टूटे बिखरे फिर निखरे
वक्त बढा हम भी बढ़ गए
अब हर पल नया सुनहरा है।

डॉ. आशु जैन 13/06/19

चाहतें

चाहतों ने अब अपना
घर बदल दिया
उन्होंने भी अपना
हमसफ़र बदल दिया
हम खयालो में भी
उन्ही के डूबे हुए
हमे खबर भी न हुई कि
इस कदर बदल दिया।
नादाँ था दिल मेरा
मासूम था बहुत
पाने को तुझे फिर से
एक बार मचल गया।
किस्से सुनाए हमने
तेरी बेवफ़ाई के
रूठा तो था बहुत मगर
फिर भी सम्भल गया।
अब कश्ती तो एक है
मगर मंजिल हुई जुदा
कि लहरे वही रही
और साहिल बदल गया।

डॉ. आशु जैन 7/06/19

अधूरी ख्वाहिश

कुछ अधूरी ख्वाहिशें
मेरे मन के कोने में
चुपचाप पड़ी रहती हैं
देखती है अन्याय
अत्याचार और अनाचार
फिर भी कुछ नहीं कहती हैं
चाहतें पूरी होने को
बेसबब तैयार हैं
फिर भी कुछ बाकी है
थोड़ा इंतज़ार है।
ये इच्छायें मेरी
तब तक रहेंगी अधूरी
जब तक मासूमियत
नही पनपेगी पूरी
हैवानियत इंसान पे
इस कदर हावी है
कि ढाई साल की ट्विंकल भी
बलात्कार की मारी है।
मानसिक पंगु समाज
बर्बाद कर रहा है
हमारा कल और आज
हिम्मत नही है किसी में
कि आवाज तो उठाये
अरे! बिटिया रोज मर रही है
कोई तो बचाये
देशवासियों जागो
सरकार को जगाओ
नन्ही सी कलियों को
कुचलने से बचाओ।
जब तक देश में
आसिफा, निर्भया, ट्विंकल मरेंगी
शांति की, अमन की, प्रेम की
मेरी सारी ख्वाहिशें
अधूरी ही रहेंगी।

डॉ. आशु जैन 07/06/19

मैं और आईना

खुद ही को खुद में कबसे खोज रही मैं
पा जाऊँ कैसे खुद को ये सोच रही मैं।
आईना भी देखा तो शक्ल बस मिली
मिल जाऊँ कैसे खुद से ये सोच रही मैं।
रंग चढ़े इतने कि गुम सी गई हूँ मैं
अंदर से कुछ बाहर से कुछ सी हो गई हूँ मैं
दर्पण दिखाए बस जो बाहर का रंग है
दिख जाऊँ कैसे खुद को ये सोच रही मैं।
भावनायें इतनी कि खुद को छल रही
मिलने को खुद से बेकरार मैं मचल रही
आरसी तो बस दिखाए झूठी भावना
मिल जाऊँ कैसे सच से ये सोच रही मैं।

डॉ. आशु जैन 17/06/19

गुजर बसर

अब तेरे बगैर गुजर - बसर मुश्किल है
कटेंगे कैसे ये सातों पहर मुश्किल है
जब से गया है तू, रत्ती भर न सरका ये वक्त
रात ही रात है होगी अब तो सहर मुश्किल है।
जिंदा रखने को मुझे तेरी एक झलक काफी है
मारेगा मुझे तूफानों का कहर मुश्किल है।
दिल में बस तू , तू और तू ही बसता है
इस जगह किसी और का असर मुश्किल है।
पाने को तुझे हर जतन कर लिया
बची होगी कोई कसर मुश्किल है।
जो लिखा होता मेरी किस्मत में तो तू मिलता
अब तो मुझ पर उस रब की महर मुश्किल है।
हर सफर में तो हम साथ साथ चले
बन पायेगा तू हमसफ़र मुश्किल है।


डॉ. आशु जैन 06/07/19

धड़कन

अपने दिल की हर धड़कन पे
नाम तुम्हारा लिखती हूँ
साँसों की माला पे हरदम
तुमको पी मैं सिमरती हूँ।
तुम मेरे जीवन का सपना
हर रात जिसे मैं लखती हूँ
तुम सागर की लहरें जानम
संग जिनके मैं बहती हूँ।
तुम मेरा मजबूत सहारा
काँधे जिसके सर रखती हूँ
जैसे बेल वृक्ष से लिपटे
वैसे ही तुमसे लिपटी हूँ।
जैसे चकोर चाँद को चाहे
वैसे तुमको मैं चाहूँ
वर्षा की राह पपीहा देखे
वैसे राह मैं तकती हूँ।
तुम सब पर न्यौछावर होते
मैं बस तुमपे मरती हूँ
एक जन्म में दिखा न पाऊँ
इतना प्यार मैं करती हूँ।

डॉ आशु जैन 08/07/19

सरोवर

तू बन जाए मेरे प्रेम का सरोवर
मैं तुझमे ही डुबकी लगाता रहूँ।
मौसम कोई भी हो पर तू नहीं सूखे
मैं प्रेम प्यास पल पल बुझाता रहूँ।
जब तू कभी रूठे और उल्टा बहे
मैं किनारे पे गोता लगाता रहूँ
तू बन जाए मेरे प्रेम का सरोवर
मैं तुझमे ही डुबकी लगाता रहूँ।
जब चाँदनी तुझ ही में नहाने लगे
मैं तुझे देख प्रिय मुस्कुराता रहूँ
तू बन जाए मेरे प्रेम का सरोवर
मैं तुझमे ही डुबकी लगाता रहूँ।
जब सूरज की रश्मियाँ जलाने लगें
मैं शीतलहर बन तुझे सहलाता रहूँ
तू बन जाए मेरे प्रेम का सरोवर
मैं तुझमे ही डुबकी लगाता रहूँ।
जब सर्दियां सताएं बर्फ जमने लगे
मैं प्रेम की अग्नि से पिघलाता रहूँ
तू बन जाए मेरे प्रेम का सरोवर
मैं तुझमे ही डुबकी लगाता रहूँ।
डॉ. आशु जैन 09/08/19

भारत माँ

जब जब अपनी भारत माँ पर
दुश्मन ने नज़र उठाई है
वीर जवानों ने बढ़ कर
सीने पे गोलियाँ खाई हैं।
ज्वालामुखी सी ज्वाला उनके
दिलों में जलती रहती है
देखें वो और दुश्मन भभके
ऐसी नजरें पाई हैं।
चपला सी तेजी उनके
कर्तव्यों में दिखती है
ऐसे वीरों ने निश्चित ही
भारत की शान बढ़ाई है।
एक दौर वो था जब हम सब
जकड़े थे ज़ंजीरो में
इन वीरों ने ही मिलकर
हम सबको मुक्ति दिलाई है।
इस वर्ष भी है जश्ने आज़ादी
जैसा था 47 में
खूबसूरती की मिसाल ने
इस वर्ष आज़ादी पाई है।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
अब भारत मिलकर एक हुआ
पर इस एकता की खातिर
वीरो ने जान गवाईं है।
बेटा चला गया पापा का
सिंदूर मिटा उस सजनी का
बाँधेगी वो किसको राखी
बहना की फूटी रुलाई है।
एक माँ का फर्ज निभाने को
दूजी माँ को तुम छोड़ गए
अश्रु नहीं रुकते उस माँ के
गहरी चोट जो खाई है।
हे वीर शहीदों तुम्हें नमन
नमन देश की मिट्टी को
ऐसे वीरों को पैदा करने की
ताकत जिसने पाई है।
बलिदान तुम्हारा अमर रहे
और तुम सबको अमरत्व मिले
भारत का सर न झुकने देंगे
ये कसमें हमने खाई हैं।

डॉ. आशु जैन 12/08/19

लाखों हाथ

इतने हाथ है मेरे साथ
फिर भी आज क्यों तन्हा हूँ मैं?
तू मेरा पूरा वक्त पूरा जीवन है
क्यों तेरा बस एक लम्हा हूँ मैं?
तू मेरा एक अटूट हिस्सा है
क्यों तेरी एक रात का सपना हूँ मैं?
सबकी जरूरतें और
ख्वाहिशें लिए फिरती हूँ।
फिर तुम्हारे लिए
क्यों कोई अजनबी सा अपना हूँ मैं?
तुम्हारे हाथों की कठपुतली
सा है नसीब मेरा
ईश्वर की अजीब सी
रचना हूँ मैं।
तुम्हारी इच्छाओं के बढ़ते हाथ
मेरा गला घोंट देंगे
एक हाथ से मेरे माथे को न सहला सको
क्या ऐसी कोई बेज़ार कल्पना हूँ मैं???

डॉ. आशु जैन 18/08/19

सिकंदर

राहें उनको क्या रोकेंगी जिनकी नजरें मंजिल पर हैं
तूफाँ उनको क्या रोकेंगे आंखों में जिनके समंदर हैं
कर जाएंगे जो काम बड़ा उनका ही होगा नाम बड़ा
उनका क्या होगा नाम कभी जो छिपे घरों के अंदर हैं।
है हर एक मन शक्तिशाली पर कोने में डर पलता है
कायर!तू रोके क्यों खुद को,सूरज हर रोज निकलता है
मत रख हिसाब तू कर्मों का, वो रख लेगा ऊपरवाला
तू अपने दिल को खोल जरा इसमें ही छिपा बवंडर है।
जिसने खोजा खुद को खुद में, वो उसको ही मिल पायेगा
जो लगा रहा औरों पर ही वो क्या इतिहास बनाएगा
जिसने जीती सारी दुनिया वो भी निराश था हुआ कभी
पर तू निराश न हो जाना तेरे भीतर ही सिकंदर है।
डॉ. आशु जैन 18/09/19

कुंदन

आसान कहाँ है
कुंदन बनना?
पहले तपो
फिर पिटो
जुल्म सहो
सहते रहो
उफ्फ न करो
चुप ही रहो
रोते रहो
घुटते रहो
गैरों के हाथों
पिटते रहो
सिसकते रहो
बरसते रहो
आग की लपटों में
पिघलते रहो
छिलते रहो
मिटते रहो
हर दिशा से
कटते रहो
बलिदान दो
अपमान सहो
ख्वाहिशों में अपनी
सिमटते रहो
त्याग करो
परित्याग करो
इसी को अपना
सौभाग्य कहो
दिखावा करो
खुश रहने का
जबरदस्ती सबको
चमकते दिखो
बहुत मुश्किल है
कुंदन बनना
पूरा मिटना पड़ता है
कुंदन बनने के लिए।
डॉ. आशु जैन 25/09/19

संयोग

ये कैसा इत्तेफ़ाक़ है, ये कैसा संयोग
ये खुद बखुद हुआ या लगाया कोई योग
भूली हूँ संसार को, धारा तुम्हारा जोग
बाहर से तो स्वस्थ हूँ, दिल को लगाया रोग।
हर कोई इससे गुजरा, नया नही है ये प्रयोग
किस्मत में क्यों सभी की, आ जाता है वियोग
जब परिस्थिति अनुकूल थी सबका मिला सहयोग
हवा जरा विरुद्ध हुई, लगने लगा अभियोग।
कुछ भी हो साथ रहना है, चाहे कहो हठयोग
जब मिल जायेंगे हम तुम फिर, बन जाएगा सुयोग
किस्मत में लिखा जाएगा फिर से नया संयोग
न होंगी कोई दूरियां न होगा फिर वियोग।
डॉ. आशु जैन 27/09/19

देवता या दानव

दानवों से पट रहा संसार क्यों
देवता सभी हुए असार क्यों
मानवीयता हुई लाचार क्यों
बेटियों पे बढ़ा अत्याचार क्यों?

संस्कृति पे देश की प्रहार क्यों
विदेशी भाषाओं का है प्रचार क्यों
कानून हो रहा है शर्मसार क्यों
मानवों का हो रहा व्यापार क्यों?

बन रहे हैं सब यहाँ करतार क्यो
कह रहे हैं खुद को पालनहार क्यों
हो रहा है भ्रष्टो का सत्कार क्यों
कर रही माँ भारती चीत्कार क्यों?

युवा पीढ़ी इतनी बेकरार क्यों
दौड़ है या होड़ बेशुमार क्यों
सब्र का नहीं कोई सवार क्यों
चारों तरफ है ये हाहाकार क्यों?

पल रहे हैं मन में सब विचार क्यों
हैं मानव तो पशुवत व्यवहार क्यों
करो प्रार्थना हे ईश अब स्वीकार तुम
कि इंसानियत से बना दो संसार तुम।

डॉ. आशु जैन 02/10/19

श्री राम

क्यों न आज कुछ ऐसा
काम कर जाएं
बुला लें राम को नीचे या
स्वयं ही राम बन जाएं।
दहन कर लें सभी बदमाशियों
का अपने भीतर ही
जलाकर मन के रावण को
विजयी राम बन जाएं।
चलो सबको खुशी बाटें
दुखों को दूर भी कर दें
पाके दिव्यता को हम
दिव्य श्री राम बन जाएं।
जुटा लें आज हम साहस
जूठे बेर खाने का
मिटा के जाति के बन्धन
प्रभु श्री राम बन जाएं।
न केवल मानवों से
मानवीय भाव हम पालें
मूक पशुओं को भी सम्मान देकर
राम बन जाएं।
बचा लें आज हर सीता
को पहले खुद की दृष्टि से
जलाकर फिर दशानन को
बहादुर राम बन जाएं।

डॉ. आशु जैन 06/10/19

भवानी

मन में विराजो आज भवानी
सुन लो सारे राज भवानी
अमन चैन छा जाए जग में
बजें सुखों के साज भवानी।
देश तरक्की करता जाए
ऐसी दो परवाज़ भवानी
जो चाहे सबका सुख पहले
वही बने सरताज भवानी।
जैसे राम बने थे राजा
वैसा हो महाराज भवानी
कलयुग में सतयुग आ जाए
बीता कल हो आज भवानी।
यही प्रार्थना तुमसे मैय्या
पूरी कर दो आज भवानी।
मन में विराजो आज भवानी
सुन लो सारे राज भवानी
डॉ. आशु जैन 09/10/19

शरद का चाँद

धन्य हो गई धरा
धन्य हुआ आसमान
और धन्य हो गया
शरद पूर्णिमा का चाँद।
धन्य हुआ कण-कण
धन्य हुआ प्रतिक्षण
धन्य हुआ मानव और
धन्य हुआ ये जहान।
शरद पूर्णिमा का चाँद
खुद पे है लजा गया
उस से भी मधुर एक
चाँद नीचे आ गया।
आज है वही दिवस
जब देवता आये उतर
जन्म हुआ गुरुवर का
श्रीमती-मलप्पा के घर
रात्रि में भी चन्द्रमा
दिवस में भी चन्द्रमा
प्रकृति भी हो गई थी
बहुत सुंदर अनुपमा।
ऐसा लग रहा था मानो
एक चाँद कम था
तभी तो आचार्य श्री का
हुआ भव्य जनम था।
कलयुग में सतयुगी
जीव कोई आया है
महावीर के संदेशे
ऊपर से लाया है।
धर्म को मिली दिशा
अहिंसा का बढा मान
गुरु विद्यासागर का
ध्येय है जन कल्याण।
गुरुवर के चरणों में
नतमस्तक धरा है
और आसमान से
अमृत भी झरा है।
आज का ये दिन पावन
धन्य है शरद ऋतु
गुरुदेव के चरणों में
बारम्बार नमोस्तु।
आशु का नमोस्तु।।।

©डॉ. आशु जैन 13/10/19

समय का पहिया

समय का पहिया अपनी गति से चलता है
तो फिर तू किस सोच में प्यारे घुलता है।
आज किसी का है वो कल तेरा होगा
तू चाहे न चाहे वक्त बदलता है।

कल जो दुश्मन थे दोस्त बन जाएंगे
अपने कल सपने बनकर ठुकरायेंगे
क्यों आशा रखकर खुद को तू छलता है?
तू चाहे न चाहे वक्त बदलता है।

रिश्ते नाते सब माया के बन्धन हैं
मन में अधिक बढ़ाते ये सब उलझन हैं
क्यों माया के आँचल में तू पलता है?
तू चाहे न चाहे वक्त बदलता है।

कल जो प्यार जताते थे खो जायेंगे
तुझसे पहले किसी के वो हो जायेंगे
प्यार की झूठी आग में तू क्यों जलता है!?
तू चाहे न चाहे वक्त बदलता है।

तेरे दिल तक जो पहुँचे मिल जाएगा
सपनों से अपना बन बाहर आएगा
तेरा दुःख जिसकी आँखों में खलता है
तू चाहे न चाहे वक्त बदलता है।

डॉ. आशु जैन 20/01/2020

उलझन

उलझ गई हूँ
सुलझाते हुए
झूठे रिश्तों को
निभाते हुए
वो कहता है
दुनिया अच्छी है
शर्म नहीं आती
ये बताते हुए?
औरत ही दुश्मन
 है औरत की
 दुखी भी नहीं है
 खुद को लजाते हुए!
 इंसान है तो
 इंसानियत भी चाहिए
 रो पड़ी है हर प्रजाति
 ये समझाते हुए।
 हर पल उलझती
 और बन्धन में जकड़ती
 थक गई अनसुलझे सवाल
 सुलझाते हुए।

डॉ. आशु जैन 18/01/2020


स्वच्छता का संदेश

आओ मिलकर कदम बढ़ाये
आओ मिलकर अलख जगाएं
स्वच्छ रहे तो स्वस्थ रहेंगे
आओ सबको हम बतलायें।
देश हमारा सबसे प्यारा
सबसे सुंदर सबसे न्यारा
स्वच्छता को हम फैलाकर
देश की सुंदरता को बढायें।
आओ....
भारत बन जाए विश्व की रानी
ओढ़ के सुंदर चूनर धानी
स्वच्छ्ता और स्वस्थता का
दीप जला प्रकाश फैलाये
आओ.....
प्रकृति का हाल बुरा है
हर आने वाला साल बुरा है
पर्यावरण सुरक्षित करके
धरा को रहने योग्य बनायें
आओ....
नदियों में बढ़ता प्रदूषण
जैसे रावण और खरदूषण
उनकी निर्मलता को हम यूं ही
व्यर्थ न कर उन्हें स्वच्छ बनायें
आओ....
मूक पशु कर रहे पुकार
चारों तरफ है हाहाकार
पशुओं के जीवन की खातिर
हम थोड़े इंसां बन जाएं।
आओ....
खुद रहने को काटे जंगल
कहाँ शहर और कहाँ मरुस्थल
अगर चाहिए जीवन लंबा
तो सब मिलकर वृक्ष लगायें।
आओ....
तन को तो हम स्वच्छ करें ही
मन को भी हम उजला कर लें
जाति पाँति का भेद मिटाकर
सबसे भाईचारा निभायें
आओ....
बेटा बेटी में फर्क न समझें
सबको हम जीने का हक दें
गंदी घिनौनी सोच परे कर
ऊँची मानसिकता बनायें।
आओ....

डॉ. आशु जैन 10/01/2020

अंधेरा उजाला

रातों को बदनाम किया करते हैं
जो शख्स बुरे काम किया करते हैं।
है जरूरी अगर दिन तो रात भी है
थकन के बाद ही तो आराम किया करते हैं।
सिर्फ उजाले से जीवन न चल सकेगा
न हो गर तिमिर तो पल-पल डसेगा
खुली आंखों से ही इश्क पूरा नहीं होता
बन्द आँखों से भी क़त्लेआम किया करते हैं।
घोर आशा से भी जीवन बर्बाद होता है
प्यास बिना पानी को कौन रोता है
कड़ी धूप में छाया की कदर होती है
वरना हम कहाँ पेडों का इंतजाम किया करते हैं।
सूरज की तपिश से बचाने के लिए
चाँदनी आती है जख्म छिपाने के लिए
गर न हो तपन तो कौन पूछेगा चांदनी को
हम कहाँ जख्मो को सरे आम किया करते हैं।

डॉ. आशु जैन 08/01/2020

नया सफर

सड़कों पे चलते
दूरियों को नापते
लम्बाई को जाँचते
हम चल रहे है
नए सफर पे
निकल रहे हैं
आसमान की ऊँचाई
समुद्र की गहराई
को मापने हम
मचल रहे हैं
हम नए सफर पे
निकल रहे हैं।
देखने को चाँद
छूने पूरा आसमान
धरती पर हम जोर से
उछल रहे हैं
हम नए सफर पे
निकल रहे हैं।
बेड़ियो को तोड़ेंगे
बेटियों को जोड़ेंगे
बंधनों को पैरों तले
कुचल रहे हैं
हम नए सफर पे
निकल रहे हैं।

डॉ. आशु जैन 05/01/2020

वो गरीब!!

शीत लहर, बनी कहर
न आ रही कहीं पकड़
सब बेअसर सा हो गया
गरीब वो गुजर गया
 प्रकृति के कोप से
 ठंड के प्रकोप से
 वो सर्दी में ठिठुर गया
 गरीब वो गुजर गया।
 कम्बलों की खोज में
 मन्दिरों में मस्जिदों में
 गाँव से शहर गया
 गरीब वो गुजर गया।
 गांव मिटे बने शहर
 हमने फैलाया जहर
 वो बेचारा मर गया
 गरीब वो गुजर गया।
 न सेकता न तापता
 वो हो गया है लापता
 ठंड से वो डर गया
 गरीब वो गुजर गया।

डॉ. आशु जैन 03/01/2020

सौगात


पिछले 20 दिनों से अनु उसका पति मितेश और उसकी दो साल की बेटी न्यासा मुम्बई के अस्पताल में अनु की मां का इलाज करा रहे थे। माताजी का स्वास्थ्य बहुत ज्यादा खराब हो चुका था और उन्हें आनन फानन में ICU में भर्ती किया गया था। शरीर में रक्त, प्रोटीन और महत्वपूर्ण विटामिन की कमी थी, शरीर जर्जर हो चुका था उम्मीद टूटती जा रही थी। अनु दिन रात प्रार्थना करती अंदर ही अंदर घुटती, खून के आँसू रोती लेकिन माँ के सामने मजबूती से खड़ी रहकर प्रोत्साहित करती और उन्हें समझाती कि वे जल्दी ही ठीक हो जायेंगी। अनु के लिए उसकी माँ दुनिया में सबसे ज्यादा अज़ीज़ थीं क्योंकि उनके अलावा उसका अपना कोई नहीं था। रिश्तेदारों ने तो अनु की शादी के बाद ही उससे रिश्ता तोड़ लिया था, मामा लोगों से भी जो उम्मीद थी वह भी इस कठिन दौर में टूट गई थी। माताजी का गिरता स्वास्थ्य और उनका बहकी-बहकी बातें करना, भूल जाना इत्यादि अनु को भीतर से कमजोर कर रहा था। इसी बीच 12 दिसम्बर को उसकी और मितेश की शादी की सालगिरह थी, लेकिन इस दशा में उन दोनों को याद ही नही रहा। सब कुछ वैसे ही चल रहा था कि अचानक माताजी ने पूछा आज कितनी तारीख है और जैसे ही अनु ने कहा आज 12 दिसंबर है माँ तो वह बोली अरे आज तो तुम्हारी सालगिरह है। इतना सुनते ही अनु की आँखों से झर झर आँसू बहने लगे आखिर इससे अच्छी कोई और सौगात हो सकती थी उसकी सालगिरह की?

डॉ. आशु जैन 31/12/19

ओ 2019

ओ 2019,
जा तो रहे हो तुम
लेकिन पीछे से छूटी है
दिलों में गहरी टीस।
तुमसे एक ही है विनती
लौटकर न आना
न देना जख्म फिर से
न बेटियों को सताना।
एक और है गुजारिश
जो मान लो अगर तुम
तुम जैसा कोई साल
न देखें फिर कभी हम।
वैसे तो ये विदाई,
होती बड़ी दुखद है
पर तुम्हारा ऐसा जाना
लागे बड़ा सुखद है।
कोशिश यही करेंगे
लम्बी हो ये जुदाई
तुम लौटकर न आना
दें ऐसी हम विदाई।

डॉ. आशु जैन 30/12/19

सुन लो न माँ

माँ
सुनो न
तुम्हारे होने से मेरा होना है
तुम्हारे खोने से मेरा खोना है
माँ
सुनो न
तुम रहती हो पास तो होती है आस
तुमसे ही तो है मुझे रब पे विश्वास
माँ
सुनो न
तुम हो तभी तक मैं सख्त हूँ
जो तुम नहीं तो मैं भी निशक्त हूँ।
माँ
सुनो न
मुझे जो हौसला दिया थोड़ा खुद भी ले लो
इतना कुछ झेला है थोड़ा और झेल लो
माँ
देखो न
बेटी तुम्हारी कितनी उदास है
आज मेरी आँखों को सिर्फ तुम्हारी तलाश है।
माँ
जीत जाओ न एक बार ये जंग
आ जाओ न वापस भर दो जीवन में उमंग।
माँ
सुनो न
बस एक बार सुन लो न।

डॉ. आशु जैन 12/12/19

शबनम

ये शबनमी आँखें
ये चेहरे पे चमक
वाकई खुश हो या
बस दिखा रहे हो।
ये बार बार मुस्काना
धीरे से नजरें चुराना
दिल लग गया कहीं पे
या कुछ छिपा रहे हो।
मेरी नजरों में तुम हो
तुम अपने में गुम हो
कह दो जो कहना है
क्यों खुद को बहला रहे हो।
चोर नजर से देखते हो
हम देख लें तो झेंपते हो
इधर उधर की बातें बना के
धीरे से शरमा रहे हो।
आओ दो बातें करें
कुछ हसीं मुलाकातें करें
इस शबनमी मौसम में
क्यों हमको तड़पा रहे हो।

डॉ. आशु जैन 22/11/19

अकेलापन

चलो
आज एक
काम करते हैं
कुछ नहीं कहते
बस एक दूजे को
सुनते हैं।
बहुत हुई
बाते बहसें और लड़ाइयां
आज मौन होकर
सुनते हैं अपनी
खामोशियाँ
होकर साथ
एक दूजे के
मिटा लेते हैं
सारी तन्हाईयाँ
चुप रहकर ही
सुलझा लेते हैं
अपनी सारी
लड़ाइयां
चलो
आज न कुछ
कहें न सुनें
बस महसूस करें
एक दूजे की
उपस्थिति
और दूर कर दें
बेइंतहा फैला हुआ
अकेलापन।।।

डॉ. आशु जैन 17/11/19

रोशनी

तुमने आकर ज़िन्दगी में
रोशनी राहों में भर दी
हमने भी हंसते हुए ये
ज़िन्दगी तेरे नाम कर दी।
क्या हुआ जो जख्म लाखों
झेले थे नादाँ से दिल ने
तुमने आकर सूने हृदय में
प्यार की बरसात कर दी।
एक तड़प थी कुछ कमी थी
कुछ अधूरापन था बाकी
थामकर ये हाथ मेरा
सारी कमियाँ पूरी कर दी।
मुस्कुराहट भूल बैठी
लब पे रीतापन था गहरा
अब खिली हूँ खिल गई हूँ
मांग जो सिंदूरी भर दी।

डॉ. आशु जैन 13/11/19

काश!!!

काश! मैं समझा पाती तुम्हें
कितना कठिन होता है
बहते हुए आँसुओ को रोकना
कहते कहते चुप होकर सोचना
धड़कते दिल को जबरदस्ती थामना
कुछ लोगों से मुश्किल भरा सामना
कितना कठिन होता है।
काश मैं बता पाती तुम्हें
कितना मुश्किल है
हर किसी को अपना बनाना
दिन रात सबके लिए
सपने सजाना
मकान को घर बनाकर
कोना कोना जगमगाना
और जब वही लोग आपको
पराया से कर दें
आपके रास्ते मुश्किलों से
भर दें
फिर उन्हीं को अपना बनाना
कितना मुश्किल होता है।
काश!!!! समझा पाती मैं तुम्हें
बहुत कठिन है राह जीवन की
दूसरी पारी एक औरत की
खोकर अपनी पहचान
आत्मविश्वास और आत्मसम्मान
नित नई चुनौतियों से सामना
अपने लिए बेपरवाही को भांपना
कितना मुश्किल होता है।
काश!!! समझा पाती तुम्हें।

डॉ. आशु जैन 10/11/19

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन न...