Monday, January 20, 2020

काश!!!

काश! मैं समझा पाती तुम्हें
कितना कठिन होता है
बहते हुए आँसुओ को रोकना
कहते कहते चुप होकर सोचना
धड़कते दिल को जबरदस्ती थामना
कुछ लोगों से मुश्किल भरा सामना
कितना कठिन होता है।
काश मैं बता पाती तुम्हें
कितना मुश्किल है
हर किसी को अपना बनाना
दिन रात सबके लिए
सपने सजाना
मकान को घर बनाकर
कोना कोना जगमगाना
और जब वही लोग आपको
पराया से कर दें
आपके रास्ते मुश्किलों से
भर दें
फिर उन्हीं को अपना बनाना
कितना मुश्किल होता है।
काश!!!! समझा पाती मैं तुम्हें
बहुत कठिन है राह जीवन की
दूसरी पारी एक औरत की
खोकर अपनी पहचान
आत्मविश्वास और आत्मसम्मान
नित नई चुनौतियों से सामना
अपने लिए बेपरवाही को भांपना
कितना मुश्किल होता है।
काश!!! समझा पाती तुम्हें।

डॉ. आशु जैन 10/11/19

No comments:

Post a Comment

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन न...