खुद ही को खुद में कबसे खोज रही मैं
पा जाऊँ कैसे खुद को ये सोच रही मैं।
आईना भी देखा तो शक्ल बस मिली
मिल जाऊँ कैसे खुद से ये सोच रही मैं।
रंग चढ़े इतने कि गुम सी गई हूँ मैं
अंदर से कुछ बाहर से कुछ सी हो गई हूँ मैं
दर्पण दिखाए बस जो बाहर का रंग है
दिख जाऊँ कैसे खुद को ये सोच रही मैं।
भावनायें इतनी कि खुद को छल रही
मिलने को खुद से बेकरार मैं मचल रही
आरसी तो बस दिखाए झूठी भावना
मिल जाऊँ कैसे सच से ये सोच रही मैं।
डॉ. आशु जैन 17/06/19
पा जाऊँ कैसे खुद को ये सोच रही मैं।
आईना भी देखा तो शक्ल बस मिली
मिल जाऊँ कैसे खुद से ये सोच रही मैं।
रंग चढ़े इतने कि गुम सी गई हूँ मैं
अंदर से कुछ बाहर से कुछ सी हो गई हूँ मैं
दर्पण दिखाए बस जो बाहर का रंग है
दिख जाऊँ कैसे खुद को ये सोच रही मैं।
भावनायें इतनी कि खुद को छल रही
मिलने को खुद से बेकरार मैं मचल रही
आरसी तो बस दिखाए झूठी भावना
मिल जाऊँ कैसे सच से ये सोच रही मैं।
डॉ. आशु जैन 17/06/19
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