Monday, January 20, 2020

उलझन

उलझ गई हूँ
सुलझाते हुए
झूठे रिश्तों को
निभाते हुए
वो कहता है
दुनिया अच्छी है
शर्म नहीं आती
ये बताते हुए?
औरत ही दुश्मन
 है औरत की
 दुखी भी नहीं है
 खुद को लजाते हुए!
 इंसान है तो
 इंसानियत भी चाहिए
 रो पड़ी है हर प्रजाति
 ये समझाते हुए।
 हर पल उलझती
 और बन्धन में जकड़ती
 थक गई अनसुलझे सवाल
 सुलझाते हुए।

डॉ. आशु जैन 18/01/2020


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