किसको बताऊँ कितना मैं मजबूर हो गया हूँ
सुबह से लेकर रात तक मजदूर हो गया हूँ।
चर्चे बड़े हैं मेरे शहर ए तमाम में
कि देखते ही देखते मशहूर हो गया हूँ।
जिनको फ़िकर नहीं थी मेरी पूछते हैं अब
सोचकर इसे मैं मगरूर हो गया हूँ।
आदमी बड़ा नहीं था फ़क़त आदमी ही था
शर्मिंदा थे जो मुझपे उनका ग़ुरूर हो गया हूँ।
सब ओर फैला है जो वो नूर है मेरा
जब खुद में झाँकता हूँ तो बेनूर हो गया हूँ।
डॉ. आशु जैन 01/05/19
सुबह से लेकर रात तक मजदूर हो गया हूँ।
चर्चे बड़े हैं मेरे शहर ए तमाम में
कि देखते ही देखते मशहूर हो गया हूँ।
जिनको फ़िकर नहीं थी मेरी पूछते हैं अब
सोचकर इसे मैं मगरूर हो गया हूँ।
आदमी बड़ा नहीं था फ़क़त आदमी ही था
शर्मिंदा थे जो मुझपे उनका ग़ुरूर हो गया हूँ।
सब ओर फैला है जो वो नूर है मेरा
जब खुद में झाँकता हूँ तो बेनूर हो गया हूँ।
डॉ. आशु जैन 01/05/19
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