Monday, January 20, 2020

मजबूर

किसको बताऊँ कितना मैं मजबूर हो गया हूँ
सुबह से लेकर रात तक मजदूर हो गया हूँ।
चर्चे बड़े हैं मेरे शहर ए तमाम में
कि देखते ही देखते मशहूर हो गया हूँ।
जिनको फ़िकर नहीं थी मेरी पूछते हैं अब
सोचकर इसे मैं मगरूर हो गया हूँ।
आदमी बड़ा नहीं था फ़क़त आदमी ही था
शर्मिंदा थे जो मुझपे उनका ग़ुरूर हो गया हूँ।
सब ओर फैला है जो वो नूर है मेरा
जब खुद में झाँकता हूँ तो बेनूर हो गया हूँ।
डॉ. आशु जैन 01/05/19

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