Monday, January 20, 2020

आभूषण

न दिन में चैन, न रात में चैना
देखन तोखों तरसें नैना
फिरूं मैं मारी पाऊँ कहीं न
का सखि साजन! न सखि गहना।

हृदय हुआ है बेकल बेकल
दिन रात बहें आँखों से अश्रु जल
मिले जो तू तो बढ़े हृदयबल
का सखि साजन! न सखि पायल।

मिला जो तू तो भूली सोना
जमकर नाची अपने अँगना
रोना छोड़ के सीखी हँसना
का सखि साजन! न सखि कँगना।

नजर लगे न तू है काला
खुशी से मुँह पे जड़ गया ताला
तू है मेरे मय का प्याला
का सखि साजन! न सखि माला।

कमर के चारों ओर तू हरदम
छुए तो लगे कि छिड़ गई सरगम
चलूँ तो बढ़ती सबकी धड़कन
का सखि साजन! न सखि करधन।

डॉ. आशु जैन 

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