Monday, January 20, 2020

धड़कन

अपने दिल की हर धड़कन पे
नाम तुम्हारा लिखती हूँ
साँसों की माला पे हरदम
तुमको पी मैं सिमरती हूँ।
तुम मेरे जीवन का सपना
हर रात जिसे मैं लखती हूँ
तुम सागर की लहरें जानम
संग जिनके मैं बहती हूँ।
तुम मेरा मजबूत सहारा
काँधे जिसके सर रखती हूँ
जैसे बेल वृक्ष से लिपटे
वैसे ही तुमसे लिपटी हूँ।
जैसे चकोर चाँद को चाहे
वैसे तुमको मैं चाहूँ
वर्षा की राह पपीहा देखे
वैसे राह मैं तकती हूँ।
तुम सब पर न्यौछावर होते
मैं बस तुमपे मरती हूँ
एक जन्म में दिखा न पाऊँ
इतना प्यार मैं करती हूँ।

डॉ आशु जैन 08/07/19

No comments:

Post a Comment

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन न...