Monday, January 20, 2020

वो समय

सतयुग से चलते चलते
जो कलयुग में आ पहुंचा है
वो समय ब्रम्ह की वाणी से
गतिमान हुआ न ठहरा है।

वो आगे आगे चलता है
हम छूट कहीं जाते पीछे
बातें बातों में भूल गए
दिल में यादों का पहरा है।

शब्दों के जालों में उलझे
बातों के अर्थ नहीं समझे
उर्दू इंग्लिश सब सीख लिया
पर दिल में बसा ककहरा है।

दिन रात गए सालों गुज़रे
हम टूटे बिखरे फिर निखरे
वक्त बढा हम भी बढ़ गए
अब हर पल नया सुनहरा है।

डॉ. आशु जैन 13/06/19

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