Monday, January 20, 2020

लाखों हाथ

इतने हाथ है मेरे साथ
फिर भी आज क्यों तन्हा हूँ मैं?
तू मेरा पूरा वक्त पूरा जीवन है
क्यों तेरा बस एक लम्हा हूँ मैं?
तू मेरा एक अटूट हिस्सा है
क्यों तेरी एक रात का सपना हूँ मैं?
सबकी जरूरतें और
ख्वाहिशें लिए फिरती हूँ।
फिर तुम्हारे लिए
क्यों कोई अजनबी सा अपना हूँ मैं?
तुम्हारे हाथों की कठपुतली
सा है नसीब मेरा
ईश्वर की अजीब सी
रचना हूँ मैं।
तुम्हारी इच्छाओं के बढ़ते हाथ
मेरा गला घोंट देंगे
एक हाथ से मेरे माथे को न सहला सको
क्या ऐसी कोई बेज़ार कल्पना हूँ मैं???

डॉ. आशु जैन 18/08/19

No comments:

Post a Comment

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन न...