इतने हाथ है मेरे साथ
फिर भी आज क्यों तन्हा हूँ मैं?
तू मेरा पूरा वक्त पूरा जीवन है
क्यों तेरा बस एक लम्हा हूँ मैं?
तू मेरा एक अटूट हिस्सा है
क्यों तेरी एक रात का सपना हूँ मैं?
सबकी जरूरतें और
ख्वाहिशें लिए फिरती हूँ।
फिर तुम्हारे लिए
क्यों कोई अजनबी सा अपना हूँ मैं?
तुम्हारे हाथों की कठपुतली
सा है नसीब मेरा
ईश्वर की अजीब सी
रचना हूँ मैं।
तुम्हारी इच्छाओं के बढ़ते हाथ
मेरा गला घोंट देंगे
एक हाथ से मेरे माथे को न सहला सको
क्या ऐसी कोई बेज़ार कल्पना हूँ मैं???
डॉ. आशु जैन 18/08/19
फिर भी आज क्यों तन्हा हूँ मैं?
तू मेरा पूरा वक्त पूरा जीवन है
क्यों तेरा बस एक लम्हा हूँ मैं?
तू मेरा एक अटूट हिस्सा है
क्यों तेरी एक रात का सपना हूँ मैं?
सबकी जरूरतें और
ख्वाहिशें लिए फिरती हूँ।
फिर तुम्हारे लिए
क्यों कोई अजनबी सा अपना हूँ मैं?
तुम्हारे हाथों की कठपुतली
सा है नसीब मेरा
ईश्वर की अजीब सी
रचना हूँ मैं।
तुम्हारी इच्छाओं के बढ़ते हाथ
मेरा गला घोंट देंगे
एक हाथ से मेरे माथे को न सहला सको
क्या ऐसी कोई बेज़ार कल्पना हूँ मैं???
डॉ. आशु जैन 18/08/19
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