Wednesday, October 24, 2018

हल

हल:
चलो अपनी परेशानियों का हल खोजते हैं,
ज़िन्दगी के प्रश्न कुछ सरल खोजते हैं।
कल कल की भागदौड़ बन गई है ज़िन्दगी
जीने के लिए वर्तमान का ये पल खोजते हैं।
जवानी बीत गई दिखावे के मकानों में
सुकून मिले जहाँ वो सुख का महल खोजते हैं।
नफरत के पौधों से पट गई है धरती सारी
प्यार पनपे जिनसे ऐसे बीजों की फसल खोजते हैं।
शहरों के नलो से प्यास नही बुझती लोगों की
जिनसे चैन मिले ऐसी गांव की रहल खोजते है।
हर घर में गूंजे खुशियों की किलकारी
आओ बिटियों की ऐसी चहल खोजते हैं।
भीड़ बनने को तो हर युवा है तैयार
जो कमान संभाले ऐसी पहल खोजते हैं।
डॉ. आशु जैन 24/10/18

गुरुदेव विद्यासागर:

सहज, सरल, सम्यक छविधारी
कलयुग के वो बाल ब्रम्हचारी,
जन्म लिया शरद पूर्णिमा को,
नर रूप में ईश्वर के वे हैं अवतारी।
जन्म लेने के एक वर्ष में
हुआ था भारत देश आजाद,
यही इसी दिन हुआ जहाँ में
अहिंसा और दया का शंखनाद।
तप करते हैं ,ध्यान में जीते
ज्ञान भरा पर पाप से रीते,
यही प्रार्थना आपसे गुरुवर
उम्र आपके चरणों में बीते।
हमने प्रभु को नही है देखा
पर तुममें छवि जिन पाई है
आज अवतरित हुए गुरु मेरे
खुशियां ही खुशियां छाई हैं।
पूज्य गुरुवर के चरणों में बारम्बार नमन
डॉ. आशु जैन 24/10/18

Tuesday, October 23, 2018

रावण

रावण को तुम जला के प्रसन्न हो रहे
खुद को ही यूँ छिपाके प्रसन्न हो रहे
रावण की आड़ में देखो रावण हैं खड़े
पुतला जला जला के बस प्रसन्न हो रहे।
तुमसे भला था रावण बस एक रूप था
चेहरे पे चेहरा लगा के तुम प्रसन्न हो रहे।
सीता का किया हरण, पर छुआ तक नहीं
नन्ही कली कुचल कर तुम प्रसन्न हो रहे
था ज्ञानी, ध्यानी, प्रतापी वो महात्मा बड़ा
मूरख हो तुम जो उसको जला के प्रसन्न हो रहे
एक ग़लती पे रावण का नाश हो गया
अपने पतन की सोचो क्या अब प्रसन्न हो रहे??
डॉ. आशु जैन

साथ साथ


जिस तरह दिन के साथ होती है रात
तुम भी चलो न वैसे ही मेरे *साथ साथ*
जैसे होती है बादल संग बरसात
वैसे ही तुम रहो न हरदम मेरे पास
जैसे धरती का प्यार पाता है आकाश
वैसे ही मुझे भी दो न अपने प्यार का आवास,
जैसे तारों को मिलता है चाँद का प्रकाश,
वैसे ही जीवन में मेरे भर दो नूर और विश्वास,
जैसे नदियों को होती है सागर की तलाश,
वैसे ही मुझे भी है तेरे प्यार की आस।
जैसे दिल की गहराइयों में छिपे हैं कितने राज,
वैसे ही अपने दिल में छुपा लो न मुझे आज।
डॉ. आशु जैन 21/10/18

कानून

*क़ानून/ विधान*
एक दिन मैने कानून को
कटघरे में खड़ा पाया
हाथों में लाठी थी
और थी जर्जर काया
अपनी हालत और हालात पर
बहुत था वो पछताया
उसकी अवस्था देख के
मुझे भी रोना आया।
बहुत था लाचार और
बेतहाशा था दुखी
उसके होते हुए भी नही थी
 देश की बेटी सुखी
काँप रहा था कानून,
रो रहा था विधान
पूछ रहा था कैसे बचाये ,
बेटियों का सम्मान
उसके मन में उठ रहा था
 प्रश्नों का तूफान
सबसे पहला प्रश्न था,
 कैसे बनाये इंसान को इंसान?
बन गया था मख़ौल वो
और नेताओं का खिलौना
उसकी आँखों में थी पट्टी,
 और किस्मत में सोना
देख कर भी सबकुछ वो
 चुपचाप पड़ा था
अंतिम सांसे गिनता,
 वो मौत से लड़ा था
बोला, बेटा ! आजाद तो हो गये तुम
लेकिन मैं पराधीन हो गया
अपनों से ही हारकर
मैं उनके अधीन हो गया
अब तुमसे है उम्मीद,
आजादी का दिया जलाओगे
खुद को तो आजाद कर लिया,
 मुझे भी बेड़ियो से मुक्त कराओगे।
 डॉ. आशु जैन 22/10/18

Friday, October 19, 2018

क्रोध

क्रोध/ग़ुस्सा
धधक रही है ज्वाला अंदर
ख़ुद को कैसे समझाऊँ मैं
या तो शिव नीचे आ जाए
या शिव ही हो जाऊँ मैं ।
बढ़ता जाए अत्याचार
देखूँ बेबस हो लाचार
कैसे उन बदमाशों का
संहार करूँ शांति पाऊँ मैं
या तो शिव नीचे आ जाए
या शिव ही हो जाऊँ मैं ।
चारों ओर है हाहाकर
नन्ही कलियाँ करें पुकार
कैसे उन छोटी कलियों का
दामन आज बचाऊँ मैं
या तो शिव नीचे आ जाए
या शिव ही हो जाऊँ मैं ।
क्रोध से मेरे नेत्र जले
ज़हर पिलाने हाथ बढ़े
लगता है अब तांडव करके
धरती पूरी हिलाऊँ मैं
या तो शिव नीचे आ जाए
या शिव ही हो जाऊँ मैं ।
डॉ. आशु जैन

नाश / समाप्ति

रावण को तुम जला के प्रसन्न हो रहे
खुद को ही यूँ छिपाके प्रसन्न हो रहे
रावण की आड़ में देखो रावण हैं खड़े
पुतला जला जला के बस प्रसन्न हो रहे।
तुमसे भला था रावण बस एक रूप था
चेहरे पे चेहरा लगा के तुम प्रसन्न हो रहे।
सीता का किया हरण, पर छुआ तक नहीं
नन्ही कली कुचल कर तुम प्रसन्न हो रहे
था ज्ञानी, ध्यानी, प्रतापी वो महात्मा बड़ा
मूरख हो तुम जो उसको जला के प्रसन्न हो रहे
एक ग़लती पे रावण का नाश हो गया
अपने पतन की सोचो क्या अब प्रसन्न हो रहे??
डॉ. आशु जैन

Wednesday, October 17, 2018

लघुकथा- कन्या भोज

कन्या भोजन: लघु कथा
ईश्वरी अम्माँ सुबह से परेशान घूम रही थी , मुझसे देखा नहीं गया और मैंने रोक कर पूछ ही लिया की अम्माँ क्या बात है? क्यूँ परेशान हो ? वह साँस थामते हुए बोली -बेटी , क्या बताऊँ आज घर में कन्या भोजन है आठ कन्याएँ तो मिल गईं है बस एक और मिल जाए तो पूरी नौ हो जाएगी वरना कही मेरी देवी माँ नाराज़ ना हो जाए . बस इसीलिए परेशान हूँ कहते हुए वो निकल गई . इतने में मेरी पड़ोसन आके मुझसे बोली की पिछले महीने ईश्वरी की बहु तीन माह गर्भ से थी उसने सोनोग्राफ़ी करवाई और पता चला कि तीसरी भी बेटी है. ईश्वरी ने रोती बिलखती बहू की एक ना सुनी और उसका गर्भपात करा दिया. आज शायद वही एक कन्या उसके कन्या भोज में कम पड़ गई.
मेरे मन में एक सवाल अभी भी उठ रहा है - कि देवी जी एक कन्या के कम जीमने से नाराज़ होंगी या उसे गर्भ में ही मार डालने से ?
डॉ. आशु जैन 16-10-18

असत्य


कान्हा
क्यों तुम
बार बार
बात बात पर
छलते हो मुझे
क्यों नही
इस जहां के
पार
अपने उस जहाँ में
ले चलते हो मुझे?
क्यों झूठ कहते हो
कि राधा
तुम्हारी रानी है
जबकि
गोपियों संग भी
तुम्हे तो
रास लीला
रचानी है?
क्यों कहते हो
कि दिल पर
तुम्हारे
सिर्फ मेरा
अधिकार है
क्या अपनी
गोपियों से
तुम्हें कुछ
कम
प्यार है?
सुनो कान्हा!
अब
तो कहो
सत्य
मत ओढ़ो
असत्य,
तुम्हारे मुख से
बार बार
सुनना
कितना अच्छा
लगता है,
एक बार
फिर से
कह दो न
कि
कान्हा का तो
सारा जग
दीवाना है
लेकिन
कान्हा
सिर्फ
राधा का
दीवाना है।
और ये
सिर्फ सत्य होगा
समझे।
डॉ. आशु जैन 17-10-18

Sunday, October 14, 2018

Me Too


हाँ आज कहती हूँ मैं
नहीं कहा जो अब तक
सहती आयी जो अब तक
अब नहीं सहूँगी मैं
चुप नहीं रहूँगी मैं
देख लिया रिश्तों को
इतने क़रीब से
कि आती है घिन मुझे
अपने नसीब से
अपने मन की दीवारों पे
जो राज छिपाए थे मैंने
माँ तुमसे भी छिपकर
आँसू बहाए थे मैंने
अब बताऊँगी खुलके सबको
ज़ख़्म दिखेंगे मनके सबको
जब छोटी सी बच्ची थी मैं
दिल की एकदम सच्ची थी मैं
नहीं मालूम था गुड टच बैड टच
क़सम से झूठ नहीं मैं कह रही हूँ सच
हो भले वो बुज़ुर्ग या रिश्ते के भाई
मेरी अस्मिता पे तो जैसे शामत थी आयी
पहले लगा रिश्ते शायद ऐसे ही होते है
देर से अकल आयी कि ये तो बस धोखे है
धीरे धीरे बड़ी हुई अपने पैरों पर खड़ी हुई
यौवन ने दस्तक दी थी किसी से मुझे मोहब्बत हुई थी
नया नया प्यार था भरोसा बेशुमार था
एक दिन भरोसा टूट गया, मेरा प्यार मुझे ही लूट गया
प्यार तो मैंने किया था उसने तो मुझे सिर्फ़ छला था
अब जाके समझ में आया कौन बुरा कौन भला था
पश्चात्ताप में जलती रही , मन ही मन मैं घुलती रही
थोड़ी थोड़ी दिन - रात और सुबह शाम मैं पिघलती रही
अगर यूँ ही घुलती रही तो एक दिन ख़त्म हो जाऊँगी
किसी को क्या मेरी फ़िक्र है जो याद किसी को रह पाऊँगी
लगता था दुनिया की मैं ही एक अभागन हूँ
रिश्तों ने था जिसे डसा मैं एक ऐसी नागिन हूँ
जब जाना metoo के बारे में तब ये बात पता चली
इससे नहीं अछूती थी किसी भी शहर की कोई भी गली
पहले लगता था कि मैं हूँ तनहा यहाँ खड़ी
अब जाना लाखों मुझ जैसी कोई छोटी कोई बड़ी
डर लगता था कैसे अपने मन की बात बताऊँ मैं
नहीं ग़लत हूँ मैं बेबस हूँ कैसे सबको समझाऊँ मैं
भला हो me too वालों का जिनने दिल से दर्द निकाल दिया
अब मैंने भी दिल हल्का कर अपना बोझ उतार दिया.
डॉ. आशु जैन

Tuesday, October 9, 2018

ख्वाहिश

यूँ तो अधूरी रही हर ख्वाहिश 
तू मिला तो लगा पूरी हो गई
साथ जीना जरुरी था हमारे लिए
लेकिन लगता है कोई मज़बूरी हो गई .
इतने पास रहे हम सदा
अब क्यों ये अचानक दूरी हो गई
तू था दिल में तो धड़कता था दिल
अब तो ये धड़कन जरुरी हो गई .
हम मिले , साथ चले और बिछड़े
बिछड़कर तुझसे मैं अधूरी हो गई
साथ मेरे तेरी यादे और तन्हाई है
अब तो इनसे ही मेरी ज़िन्दगी पूरी हो गई .
डॉ. आशु जैन 08/10/2018




Monday, October 8, 2018

कर्म

कर्तव्य पथ पर यूँ चलूँ मैं
भूलूँ कभी न राह,
भारत माँ की करूँ मैं सेवा
हो पूरी हर चाह।
कभी कदम न डगमगाए
कभी न निकले आह
मृत्यु भी गर सामने हो तो
डर न मुझे छू पाए।
कितनी भी बाधाएँ आये
मुश्किल हो हर राह
नही हटूँगा अब मैं पीछे
चाहे जो हो जाये।
होगी हर एक बेटी सुरक्षित
दुनिया मे जो आये
भारत माँ का नाम भी अब
स्वर्णाक्षरों में लिखा जाये।
मिलकर करें कर्तव्य का पालन
कर्म से जी न चुरायें
भारत माँ की सेवा में
ये कदम बढ़ते ही जायें।
डॉ. आशु जैन

कर्तव्य



क्या याद है तुम्हे

जिस दिन तुमने

अपने हाथों में

मेरा हाथ लेकर

साथ जीने मरने की

कसम खाई थी

बिल्कुल उसी दिन से

मैंने भी

तुम्हारी हर

जिम्मेदारी

अपनी समझकर

निभाई थी

जिस दिन

तुमने अपने कर्तव्यों का

वास्ता देकर

कुर्बान किया था

मेरे हिस्से का प्यार

उस दिन भी

तुम पर

न्योछावर कर

दिया था मैने खुद को

तुम्हारे ही दायित्वों पर

उन्हें अपना समझकर

लेकिन

क्या मैं नही कुछ भी

तुम्हारे लिए?

क्या मेरे प्रति

तुम्हारा कोई

कर्तव्य नहीं?

जब अपने

कर्तव्यों से

मुक्त हो जाओ

तो सोचकर बताना।

डॉ. आशु जैन

Sunday, October 7, 2018

इधर - उधर


जिस तरह
रेगिस्तान में
पानी की
तलाश में
भटकता है मृग
इधर - उधर
उसी तरह
तेरे बिना
तेरे प्यार की
आस में
भटकता है
मेरा मन
इधर - उधर
जैसे
आसमान में
एक टुकड़ा
बादल का
फिरता है यहाँ वहाँ
वैसे ही
तुझे देखने को
फिरते हैं
मेरे दोनो नैना
जैसे कोई
पंछी
भटकता है
ठिकाने की
तलाश में
फिर बनाता है
घरौंदा
किसी पेड़ की
शाख में
वैसे ही
कबसे मैं
ढूंढ रही हूँ
एक कोना
तेरे दिल का
बनाने
अपना घरौंदा
अपना ठिकाना।
डॉ. आशु जैन

Saturday, October 6, 2018

नश्वर

क्या है नया
ये जीवन
ये शरीर
हाँ शायद
क्योंकि
आत्मा तो वही
पुरानी है
जन्मों से
चल रही
यही कहानी है
एक काया
छूटती है
दूजी
मिल जाती है
बार बार
सृष्टि अपना
नियम दोहराती है
क्यों कहें
इसे नया
आज जन्मा
कल गया
फिर से जो
आया गया
वो कहाँ
रहा नया?
नश्वर है
ये नयापन
नश्वर है ये
जीवन
नए नए की
चाह में उलझे
जाने कितने
पागल मन
नयापन तो
दिखावा है
ढोंग है
छलावा है
कुछ भी
नया नहीं
सृष्टि में
प्रकृति होती
हरी, हर
वृष्टि में
इस छलावे में
मत पड़ो
प्रभु नाम जपो
और आगे बढ़ो।
त्यागकर जन्मों
का फेर
आत्मा को
शाश्वत करो।
मोक्ष रूपी
नयेपन की
ओर अब
तुम रुख़
करो।
डॉ. आशु जैन

नया


चलो
आज कुछ
नया करते है
बदल लेते है
किरदार आपस में
तुम मैं बन जाओ
मैं बन जाऊं तुम
हो जाते हैं
गहराई में
एक दूजे
में गुम।
शिकवे सारे
शिकायतें सारी
समां जाने दो
मौन में
छिप जाने दो
आंसू
कही हृदय के
किसी कोने में
चलो न
आज मैं सुनूँ
तुम कहो न
क्यों नहीं इस
नयेपन की गहराई में
समां जाएं
एक दूजे की
तन्हाई में इस कदर
कि रहे न
किसी को
किसी की
फ़िकर
पा लें
अपने हिस्से का
विश्राम
इस नयेपन की
अनुभूति में
छिपे हैं ढेरों
ईनाम।
डॉ. आशु जैन

Thursday, October 4, 2018

अंतर्मन

अंतर्मन की सूनी दीवारें
मुझसे हर दम पूछती हैं
कहाँ छिपा है मीत तेरा
क्यों नही गाता अब गीत नया
क्यों नही लेता जीवन का मजा
क्यों नहीं मन प्रीत भरा
क्यों नही हवा में संगीत घुला
क्यों नही पैरो में घुंघरू सजा
क्यों नही होंठो पे हंसी है
क्यों आंख भरी भरी सी है
क्यों चेहरा उदास है
क्यों दिल में बेचैनी और प्यास है
मेरे पास सारे सवालों का
एक ही जवाब है
तू दूर है मुझसे
यही हकीकत है
न कि कोई ख्वाब है
तेरे बिना जीवन
बिल्कुल बेरंग है
तुझसे ही जीवन में
अनगिनत रंग है।
डॉ आशु जैन 1 /10/18

आराम

दिनभर की थकन के बाद जब मिलता है तेरी बाहों का घेरा
सच कहती हूँ प्रिय वहीं होता है पूरा आराम मेरा
सारा दिन निकलता है सुबह से शाम होती है
कि मेरी ज़िंदगी रोज़ थोड़ी तमाम होती है
न फुर्सत मुझको मिलती है न दिल पे जोर चलता है
बड़ी मुश्किल से साथ तेरे यही एक लम्हा मिलता है
थकन तो टूटने की हद को भी अब पार कर जाए
तेरे आने से टूटन भी जरा कुछ कम सी हो जाये
तू आये तो मेरे दिल को भी अब चैन आ जाये
मेरी टूटती हर एक सांस भी आराम पा जाए
कि साँसों का सिलसिला भी खत्म बस होने वाला है
मेरे पीछे नही कोई जहाँ में रोने वाला है
कि हर उस आंख का आँसू आंख में भर नही पाए
तेरे आने से दिल मेरा जरा आराम पा जाए
तू आये तो चैन से मर सकूँगी सुन मेरे हमदम
तेरे आगोश में ही मुझे आखिरी सांस आ जाये।
डॉ आशु जैन

बेटी


अधूरी ख्वाहिश पर
अंधेरे कोने में
चुपके से आंसू
बहा लेती है
बेटी है, सारे रिश्ते निभा लेती है
औरों की गलती पर
चुपचाप हाथ जोड़कर
खुद सबको मना लेती है
बेटी है, सारे रिश्ते निभा लेती है
दिल में हो कितना भी गम
चेहरे पे न दिखे शिकन
होंठो पे झूठी मुस्कान सजा लेती है
बेटी है, सारे रिश्ते निभा लेती है
इच्छाएं रह जाये अधूरी
प्यार की कमी भी न हो पूरी
फिर भी सबपे प्यार लुटा देती है
बेटी है, सारे रिश्ते निभा लेती है
डॉ आशु जैन 1/10/18

Wednesday, October 3, 2018

कसम



उड़ने दो आज मुझे पंख तो फैलाने दो

आजादी का कोई  नया गीत मुझे गाने दो

आज पंखों में मुझे परवाज़ तो लगाने दो

कसम है न रोको मुझे  आज मुझे जाने दो।

सदियों से जकड़ी हुई बेड़ियाँ हटाने दो

छुपे हुए अरमान आज खुल के बताने दो

अरसा हुआ मुस्कुराये आज मुस्कुराने दो

कसम है न रोको मुझे आज मुझे जाने दो।

आसमान तक मुझे उड़ के आज जाने दो

धरती की तरह अपना आँचल लहराने दो

पुरवा के संग मस्त होके बह जाने दो

कसम है न रोको मुझे आज मुझे जाने दो।

नदियों की कलकल से सरगम बनाने दो

पतझड़ के पत्तों से साज नए बजाने दो

झरने के संग जरा निर्झर हो जाने दो

कसम है न रोको मुझे आज मुझे जाने दो।

हंसने दो और अब न आँसू बहाने दो

तकलीफें आज मुझे सारी भूल जाने दो

खुद के नशे में मुझे खुद ही झूम जाने दो

कसम है न रोको मुझे आज मुझे जाने दो।

बंद आँखों से मुझे स्वप्न तो सजाने दो

खुली आँखों से उन्हें पूरे कर जाने दो

अपनी आजादी का मुझे जश्न तो मनाने दो

कसम है न रोको मुझे आज मुझे जाने दो।

कसम है न रोको मुझे आज मुझे जाने दो।
डॉ आशु जैन 03/10/2018

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन न...