क्या याद है तुम्हे
जिस दिन तुमने
अपने हाथों में
मेरा हाथ लेकर
साथ जीने मरने की
कसम खाई थी
बिल्कुल उसी दिन से
मैंने भी
तुम्हारी हर
जिम्मेदारी
अपनी समझकर
निभाई थी
जिस दिन
तुमने अपने कर्तव्यों का
वास्ता देकर
कुर्बान किया था
मेरे हिस्से का प्यार
उस दिन भी
तुम पर
न्योछावर कर
दिया था मैने खुद को
तुम्हारे ही दायित्वों पर
उन्हें अपना समझकर
लेकिन
क्या मैं नही कुछ भी
तुम्हारे लिए?
क्या मेरे प्रति
तुम्हारा कोई
कर्तव्य नहीं?
जब अपने
कर्तव्यों से
मुक्त हो जाओ
तो सोचकर बताना।
डॉ. आशु जैन
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