Friday, October 19, 2018

नाश / समाप्ति

रावण को तुम जला के प्रसन्न हो रहे
खुद को ही यूँ छिपाके प्रसन्न हो रहे
रावण की आड़ में देखो रावण हैं खड़े
पुतला जला जला के बस प्रसन्न हो रहे।
तुमसे भला था रावण बस एक रूप था
चेहरे पे चेहरा लगा के तुम प्रसन्न हो रहे।
सीता का किया हरण, पर छुआ तक नहीं
नन्ही कली कुचल कर तुम प्रसन्न हो रहे
था ज्ञानी, ध्यानी, प्रतापी वो महात्मा बड़ा
मूरख हो तुम जो उसको जला के प्रसन्न हो रहे
एक ग़लती पे रावण का नाश हो गया
अपने पतन की सोचो क्या अब प्रसन्न हो रहे??
डॉ. आशु जैन

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