Friday, October 19, 2018

क्रोध

क्रोध/ग़ुस्सा
धधक रही है ज्वाला अंदर
ख़ुद को कैसे समझाऊँ मैं
या तो शिव नीचे आ जाए
या शिव ही हो जाऊँ मैं ।
बढ़ता जाए अत्याचार
देखूँ बेबस हो लाचार
कैसे उन बदमाशों का
संहार करूँ शांति पाऊँ मैं
या तो शिव नीचे आ जाए
या शिव ही हो जाऊँ मैं ।
चारों ओर है हाहाकर
नन्ही कलियाँ करें पुकार
कैसे उन छोटी कलियों का
दामन आज बचाऊँ मैं
या तो शिव नीचे आ जाए
या शिव ही हो जाऊँ मैं ।
क्रोध से मेरे नेत्र जले
ज़हर पिलाने हाथ बढ़े
लगता है अब तांडव करके
धरती पूरी हिलाऊँ मैं
या तो शिव नीचे आ जाए
या शिव ही हो जाऊँ मैं ।
डॉ. आशु जैन

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