Tuesday, October 23, 2018

कानून

*क़ानून/ विधान*
एक दिन मैने कानून को
कटघरे में खड़ा पाया
हाथों में लाठी थी
और थी जर्जर काया
अपनी हालत और हालात पर
बहुत था वो पछताया
उसकी अवस्था देख के
मुझे भी रोना आया।
बहुत था लाचार और
बेतहाशा था दुखी
उसके होते हुए भी नही थी
 देश की बेटी सुखी
काँप रहा था कानून,
रो रहा था विधान
पूछ रहा था कैसे बचाये ,
बेटियों का सम्मान
उसके मन में उठ रहा था
 प्रश्नों का तूफान
सबसे पहला प्रश्न था,
 कैसे बनाये इंसान को इंसान?
बन गया था मख़ौल वो
और नेताओं का खिलौना
उसकी आँखों में थी पट्टी,
 और किस्मत में सोना
देख कर भी सबकुछ वो
 चुपचाप पड़ा था
अंतिम सांसे गिनता,
 वो मौत से लड़ा था
बोला, बेटा ! आजाद तो हो गये तुम
लेकिन मैं पराधीन हो गया
अपनों से ही हारकर
मैं उनके अधीन हो गया
अब तुमसे है उम्मीद,
आजादी का दिया जलाओगे
खुद को तो आजाद कर लिया,
 मुझे भी बेड़ियो से मुक्त कराओगे।
 डॉ. आशु जैन 22/10/18

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