Saturday, October 6, 2018

नश्वर

क्या है नया
ये जीवन
ये शरीर
हाँ शायद
क्योंकि
आत्मा तो वही
पुरानी है
जन्मों से
चल रही
यही कहानी है
एक काया
छूटती है
दूजी
मिल जाती है
बार बार
सृष्टि अपना
नियम दोहराती है
क्यों कहें
इसे नया
आज जन्मा
कल गया
फिर से जो
आया गया
वो कहाँ
रहा नया?
नश्वर है
ये नयापन
नश्वर है ये
जीवन
नए नए की
चाह में उलझे
जाने कितने
पागल मन
नयापन तो
दिखावा है
ढोंग है
छलावा है
कुछ भी
नया नहीं
सृष्टि में
प्रकृति होती
हरी, हर
वृष्टि में
इस छलावे में
मत पड़ो
प्रभु नाम जपो
और आगे बढ़ो।
त्यागकर जन्मों
का फेर
आत्मा को
शाश्वत करो।
मोक्ष रूपी
नयेपन की
ओर अब
तुम रुख़
करो।
डॉ. आशु जैन

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