Saturday, October 6, 2018

नया


चलो
आज कुछ
नया करते है
बदल लेते है
किरदार आपस में
तुम मैं बन जाओ
मैं बन जाऊं तुम
हो जाते हैं
गहराई में
एक दूजे
में गुम।
शिकवे सारे
शिकायतें सारी
समां जाने दो
मौन में
छिप जाने दो
आंसू
कही हृदय के
किसी कोने में
चलो न
आज मैं सुनूँ
तुम कहो न
क्यों नहीं इस
नयेपन की गहराई में
समां जाएं
एक दूजे की
तन्हाई में इस कदर
कि रहे न
किसी को
किसी की
फ़िकर
पा लें
अपने हिस्से का
विश्राम
इस नयेपन की
अनुभूति में
छिपे हैं ढेरों
ईनाम।
डॉ. आशु जैन

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