अंतर्मन की सूनी दीवारें
मुझसे हर दम पूछती हैं
कहाँ छिपा है मीत तेरा
क्यों नही गाता अब गीत नया
क्यों नही लेता जीवन का मजा
क्यों नहीं मन प्रीत भरा
क्यों नही हवा में संगीत घुला
क्यों नही पैरो में घुंघरू सजा
क्यों नही होंठो पे हंसी है
क्यों आंख भरी भरी सी है
क्यों चेहरा उदास है
क्यों दिल में बेचैनी और प्यास है
मेरे पास सारे सवालों का
एक ही जवाब है
तू दूर है मुझसे
यही हकीकत है
न कि कोई ख्वाब है
तेरे बिना जीवन
बिल्कुल बेरंग है
तुझसे ही जीवन में
अनगिनत रंग है।
डॉ आशु जैन 1 /10/18
मुझसे हर दम पूछती हैं
कहाँ छिपा है मीत तेरा
क्यों नही गाता अब गीत नया
क्यों नही लेता जीवन का मजा
क्यों नहीं मन प्रीत भरा
क्यों नही हवा में संगीत घुला
क्यों नही पैरो में घुंघरू सजा
क्यों नही होंठो पे हंसी है
क्यों आंख भरी भरी सी है
क्यों चेहरा उदास है
क्यों दिल में बेचैनी और प्यास है
मेरे पास सारे सवालों का
एक ही जवाब है
तू दूर है मुझसे
यही हकीकत है
न कि कोई ख्वाब है
तेरे बिना जीवन
बिल्कुल बेरंग है
तुझसे ही जीवन में
अनगिनत रंग है।
डॉ आशु जैन 1 /10/18
No comments:
Post a Comment