जिस तरह
रेगिस्तान में
पानी की
तलाश में
भटकता है मृग
इधर - उधर
उसी तरह
तेरे बिना
तेरे प्यार की
आस में
भटकता है
मेरा मन
इधर - उधर
जैसे
आसमान में
एक टुकड़ा
बादल का
फिरता है यहाँ वहाँ
वैसे ही
तुझे देखने को
फिरते हैं
मेरे दोनो नैना
जैसे कोई
पंछी
भटकता है
ठिकाने की
तलाश में
फिर बनाता है
घरौंदा
किसी पेड़ की
शाख में
वैसे ही
कबसे मैं
ढूंढ रही हूँ
एक कोना
तेरे दिल का
बनाने
अपना घरौंदा
अपना ठिकाना।
डॉ. आशु जैन
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