Sunday, January 6, 2019

सर्दी


प्यार तेरा इस सर्दी सा
पाकर जिसको मैं ठिठुर गई,
बातें भी शीतलहर सी हैं
जिनको सुनकर मैं सिहर गई।
गुस्सा तेरा जीरो डिग्री
जिसे देख के बर्फ सी जम गई
आँखें तेरी कोहरे जैसी
जिनमें खुद को पा सहम गई।
सर्द हवाओं सी साँसे
मुझको कपकपा जाती हैं
मुझे देख के तेरी घबराहट
कुछ जकड़न सी दे जाती है
ये सर्दी का मौसम जानम
हर बार यूँ ही तड़पाता है
तू सीमा पर रह जाता है
और पारा गिरता जाता है।
डॉ. आशु जैन 04/01/2019

सुनो

नया:
क्यों तुमको अब पहले सा प्यार नहीं

क्यों चाँद में अब मेरा दीदार नहीं

क्यों दो नैना मिलकर होते चार नही

सुनो ! तुम्हारा नयापन मुझे स्वीकार नहीं।

क्यों मेरे बिन दिन और रात बेकार नहीं

क्यों मेरे संग भी आता तुम्हे करार नहीं

क्यों आँखे अब करती दिल पर वार नहीं

सुनो ! तुम्हारा नयापन मुझे स्वीकार नहीं।

क्यों मुझपर पहले सा वो एतबार नहीं

क्यों मेरे रंग रूप का वो सत्कार नहीं

क्यों मेरी बातों का चढ़े खुमार नहीं

सुनो ! तुम्हारा नयापन मुझे स्वीकार नहीं।
डॉ. आशु जैन 31/12/18

बार-बार

बार-बार
तेरा चेहरा मैं देखा करूँ *बार- बार*
हर बार आता है थोड़ा ज्यादा सा प्यार
तू नजरें मिलाये तो धड़क जाता है दिल
सहम जाती हैं सांसे खो जाता है करार।
अरमान थोड़े और बढ़ जाते हैं हर बार
लगता है नाचूँ पहन के घुंघुरू हज़ार
तेरे आने की खबर जब आती है पास
आ जाता है मज़ा बढ़ जाता इंतजार।
जब सामने आके तू रुक जाता है मेरे यार
उड़ जाते हैं होश छा जाता है खुमार
कैसे बताऊँ तुझे हाल-ए-दिल सनम
नासाज़ हो जाती है तबियत आ जाता है बुखार।
मान ले तू  मेरी बात बस आज एक बार
छोड़ के दुनियादारी घर आजा दिलदार
बन जा मेरा सिंदूर चमका दे साज सिंगार।
डॉ. आशु जैन 30/12/18

वो

वो मीत मेरा मनमीत मेरा
जीवन का वो हर गीत मेरा
मेरे अंधियारे हर पल में
आशाओं का वो दीप मेरा।
जब-जब तन्हाई ने घेरा
वो बनता है संगीत मेरा,
जब प्यार की नदियाँ सूखी हो
वो देता सुख का नीर झरा,
जब पतझड़ का मौसम आये
वो करता दिल को हरा भरा,
जब सूनी रातें डसती हैं,
वो चाँदनी देता है बिखरा
जब उम्मीदें सारी टूटी हों
वो भर देता उत्साह नया
वो मीत मेरा मनमीत मेरा
जीवन का वो हर गीत मेरा।
डॉ. आशु जैन 29/12/18

मजदूर


उसके जीवन में पल भर विश्राम नहीं
मजबूर है वो मजदूरी उसका काम नहीं
चैन सुकून से कट जाए वह शाम नहीं
क्यों? धनिकों सा वह भी धनवान नहीं।
जीवन उसका साधारण कोई शान नहीं
मदद करे वो सबकी पर अभिमान नहीं
अपनी अच्छाई का उसको मान नहीं
क्यों? धनिकों सा वह भी धनवान नहीं।
 *रोज* मजूरी करे तभी वो खा पाए
कभी कभी तो भूखे पेट ही सो जाए
उसको मिला कुबेर से कोई वरदान नहीं
क्यों? धनिकों सा वह भी धनवान नहीं।
उसके साथ तो पल पल ही लाचारी है
दुख सहकर भी हँसके उम्र गुजारी है
है जरूरतमंद मगर बेईमान नहीं
क्यों? धनिकों सा वह भी धनवान नहीं।
डॉ. आशु जैन 28/12/18

पाती: 2050 की 2018 के नाम

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प्रिय 2018,
सादर नमन।
वैसे नमन करने की इच्छा तो बिल्कुल नही है किन्तु भारत से संस्कार अभी पूरी तरह विलुप्त नहीं हुए हैं अतएव नमन स्वीकार करें। ये पाती तो प्रेम की लिखनी है लेकिन आप लोगों ने धरती पर प्रेम , विश्वास जैसा कुछ नहीं छोड़ा इसलिए थोड़ी नफरत भरी पाती लिख रहा हूँ।
वैसे छोटा मुँह और बड़ी बात है फिर भी कह रहा हूँ कि आपकी पीढ़ी दुनिया की सबसे स्वार्थी पीढ़ी होगी जिसने केवल खुद के बारे में ही सोचा, कभी यह नहीं सोचा कि आगे आने वाली पीढ़ियों को विरासत में क्या मिलेगा। आपने जल को बर्बाद कर दिया, वायु प्रदूषण इतना बढ़ा दिया कि साँस लेना भी मुश्किल हो गया है, हम बिना ऑक्सीजन मास्क के बाहर नहीं निकल सकते। जनसंख्या इतनी बढ़ गई है कि हमारे लिए बनाए गए खेल के मैदान भी पार्किंग में तब्दील हो गए हैं। जंगल नष्ट हो चुके हैं और नए वृक्ष लगाने की जगह ही नहीं बची है।
काश आप लोगों ने हम लोगों के बारे मे जरा भी सोचा होता तो हम भी गर्मी की छुट्टियों में नानी के घर जाते, पेडों से आम तोड़ते, नदियों में नहाते पर अब तो सालभर सिर्फ गर्मी ही रहती है, छुट्टियां a.c. में बीतती हैं इसी वजह से हम लोगों मे रोगप्रतिरोधक क्षमता भी अत्यंत कम है जिसका दुष्परिणाम हमें अपने प्राण तक देकर चुकाना पड़ता है।
हाँ! लेकिन मैं आपको भरोसा दिलाता हूँ कि हमारे आगे आने वाली पीढियां हमसे इतनी दुखी कभी नहीं होंगी।
चरण स्पर्श (अनिच्छा से)
आपका पराया
2050

डॉ. आशु जैन 27/12/18

ओस की बूंद

ओस की नन्ही सी बूँद
देती है बहुत बड़ा संदेश
न हो कोई भेदभाव
न रखो किसी से क्लेश।
मिटना तो हम सबको है
फिर गर्मी किस बात की
मेरी तरह शीतल रहो और
करो प्रकृति का समावेश।
जी भर कर करो खुद से प्रेम
जैसे मैं करती हूँ
अपने दो पल के जीवन में भी
इंद्रधनुषी रंग भरती हूँ।
तुम भी धरो खुद में
जोश उमंग और उत्साह का भेष
ओस की नन्ही सी बूँद
देती है बहुत बड़ा सन्देश।
डॉ. आशु जैन 26/12/18

दिल

आज बारिश में भीगने का मजा आ गया
आंखों में आंसुओं का जलजला आ गया
जी भर के भीगे, जी भर के रोये
बेजार रोने का मजा आ गया।
भरी बरसात और तेरी याद, वाह!!
दोनों के साथ होने का मजा आ गया।
तेरी यादें अक्सर आंखे नम किया करतीं थीं
तेरी यादों को भिगोने का मजा आ गया।
हर पल रोया है *दिल* , तुझे खोने के बाद
आज यादों में खोने का मजा आ गया।
मैं तुझे ढूँढा करती थी बाहर हर जगह
आज खुद में तेरे होने का मजा आ गया।
पहले तेरी बातें इधर उधर की लगती थीं
आज बातों की कड़ियाँ पिरोने का मजा आ गया।
अब तलक अकेली थी मैं तन्हाइयों से घिरी
सुनसान सड़कों पे तेरे साथ होने का मजा आ गया
जिस्म तो बने ही हैं जुदा होने के लिए
रूह से रूह के साथ होने का मजा आ गया।
डॉ. आशु जैन

संगीत

संगीत
तू मीत है, मनमीत है
जीवन का तू संगीत है
मेरे हृदय में झांक ले
तुझसे शुरू हर प्रीत है।
तू ही मेरी जीवन कथा
तुझसे जुड़ा हर गीत है
तू प्राण है तू चेतना
तुझपे खतम हर रीत है।
तू श्वास है धड़कन तुही
तू नहीं तो टीस है
तू दूर है तो हार है
तू पास है तो जीत है।
डॉ. आशु जैन 19/12/18

लब

लब:
कभी लबों पे मुस्कान की वजह मिल जाये
कुछ ऐसा हो कि मुझसे तू बेवजह मिल जाये।
कभी न रात आये न कभी कोई शाम ही ठहरे
कि तेरे मिलने पे एक ऐसी सुबह मिल जाये।
जिसमें तू ही तू हो बस तेरा ही ज़िक्र फैला हो
बातों और जज़्बातों की कोई ज़िरह मिल जाये।
कि अब हम थक चुके हैं दम नही है और लड़ने का
बिना अल्फाजों की अब कोई सुलह मिल जाये।
न जिसमे हार हो मेरी न जिसमे हार हो तेरी
हम दोनों खुश हो लें ऐसी फतह मिल जाये।
डॉ. आशु जैन 17/12/18

ताना-बाना

ताना-बाना:
कल तक बुन रही थी सपनों का ताना-बाना
आज से ही शुरू नया सफर हो गया
कल तक मेरे हर सपने में तू था
आज से तू मेरा हमसफ़र हो गया।
तू मिला है मुझे मेरी खुशनसीबी है,
मुझ पर मेहरबान मुकद्दर हो गया
सपने हकीकत बने, खिल गई हूँ मैं,
ऐसा मुझ पर तेरा असर हो गया।
तेरी आदतें कब मेरी बन गईं पता न चला
प्यार तुझसे मेरी जाँ इस कदर हो गया,
तुझपे कुर्बान हुए हमने सब लुटा दिया
और तू ही हमसे बेखबर हो गया।
माना कि प्यार तुझे भी उतना ही है
पर तेरी खामोशी से सब बेअसर हो गया।
आ चलें वापस सपनो के उस जहान में
हकीकत में तो जीवन ज़हर हो गया।
डॉ. आशु जैन 16/12/18

साईं से मुलाकात

साईं से भेंट: यात्रा वृत्तांत
बात लगभग दस वर्ष पुरानी है, मैं और मेरी एक सहेली बैंक की परीक्षा देकर भोपाल से जबलपुर आने के लिए ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। रिज़र्वेशन था इसलिये चिंता की कोई बात नहीं थी। ट्रेन प्लेटफार्म क्रमांक 4 पर आने वाली थी लेकिन पता नही क्यों हम दोनों क्रमांक 1 पर इंतजार कर रहे थे। पेपर तो 5 बजे खत्म हो गया था और ट्रेन 11 बजे की थी तो हमने प्लेटफार्म पर ही समय बिताना उचित समझा लेकिन समझने में गलती के कारण हम 4 की बजाय 1 पर इंतजार करते रहे। बातों में मशगूल थे तो और भी निश्चिंतता से केवल इंतज़ार कर रहे थे। जब 11 बज गए और ट्रेन नही आई तो मैंने अपने पास खड़े एक रेल कर्मचारी से पूछा कि ट्रेन क्यों नहीं आई तो उसने इशारा करके बताया कि वो तो खड़ी है आपके सामने 4 नम्बर पे।
सुनकर हमदोनों की हालत खराब हो गई क्योंकि ट्रेन का हॉर्न बज चुका था और 1 से 4 पर पहुचना बिल्कुल भी आसान नहीं था।
फिर भी चाहे जो हो जाये जाना तो है ही ऐसा सोचकर हम दोनों ने दौड़ लगा दी। मेरे मन मे उस दिन पता नहीं क्यों लगातार साईं का नाम चल रहा था , हम बस लगातार दौड़ रहे थे कि ट्रेन चल पड़ी अब समझ ही नहीं आ रहा था क्या करें फिर पता चला कि हबीबगंज में थोड़ी देर ट्रैन रुकती है हम दोनों ने एक ऑटो किया और उसको अपनी परेशानी बताई , उस ऑटो वाले ने ऐसा ऑटो चलाया कि यदि गलती से कोई दुर्घटना हो जाती तो हममें से कोई नहीं बचता फिर भी भगवान की कृपा से हम हबीबगंज पहुँच गए।
वहाँ पता चलता है कि ट्रेन छूटने का समय हो गया है फिर दौड़ लगाई मै हिम्मत हार रही थी कि पता नहीं कहां से एक अंकल आये और बोले वो सामने ट्रैन है बैठ जाओ हम जैसे ही ट्रेन में चढ़े हॉर्न बजा और ट्रेन चल पड़ी तभी एक दूसरे अंकल कहते हैं कि इतने सालों से इस ट्रेन में सफर कर रहा हूँ ये 2 मिनट से ज्यादा हबीबगंज में नही रुकती आज इतनी देर तक रुकी है आप लोगो के लिए। मैंने पहले वाले अंकल को खिड़की से ढूंढने की और उन्हें धन्यवाद देने की कोशिश की लेकिन वहां कोई नही था। मुझे लगा कि शायद साईं मेरे मन से निकलकर प्रत्यक्ष आकर मार्गदर्शन कर गए।
मैं एक खिलाड़ी रह चुकी हूँ मैंने 10 वर्ष बास्केटबॉल खेला है ढेरों यात्राएं की हैं लेकिन ये यात्रा मुझे भुलाये नहीं भूलती।

डॉ. आशु जैन 13/12/18

योद्धा

लक्ष्मी!तुम अकेली नहीं हो
तुम जैसी और भी बहुत हैं
जो योद्धा की तरह
लड़ रहीं हैं
स्वयं से
एवं इस समाज से
समाज की
दोहरी मानसिकता से
जो कहता है
कि क्यों नहीं
तुमने
इकरार किया
उसके प्यार से
इनकार क्यों किया
अब अगर
उसने तुम पर
तेज़ाब फेंका
तो इसमें
उसकी क्या गलती?
शुक्र है
कि तुम
ऐसे समाज की
बातों में नहीं आईं।
लाखों टुकडों
में टूटकर भी
खुद को जोड़ा
और लड़ पड़ीं
समाज से कानून से
लेकर साथ अपने ही जैसी
और वीरांगनाओं को
खुद को साहस दिया
साथ ही
उन्हें भी जीवन
के नए रंग दिए।
तुम एक सच्ची
योद्धा हो
जो अनवरत लड़ रही है
इस पंगु समाज की
दोहरी मानसिकता से।
हम सबको तुम पर
गर्व है।

डॉ. आशु जैन 10/12/18

सब्र


संग *जीने- मरने* की कसमें थीं
रीति रिवाज थे, रस्में थीं
वो प्रीत का धागा टूट गया
मेरे सब्र का बाँध टूट गया।
साक्षी था वो आसमान
और साक्षी सभी वो तारे थे
जिनके दामन में बैठ के हमने
दिन और रात गुजारे थे।
वो आसमान का तारा भी
मेरी दुआओं में टूट गया
मेरे सब्र का बाँध टूट गया।
वो अग्नि बनी थी साक्षी
जिसके लिए हमने फेरे थे
वचनों में बाँधा था सबने
मैं तुम्हारी थी तुम मेरे थे
कसमो का एक एक मोती
प्रीत की डोर से छूट गया
मेरे सब्र का बाँध टूट गया।
जीवन की आपाधापी में
हम भूल गए एक दूजे को
न याद रहा था कुछ हमको
न याद रहा कुछ भी तुमको
अब यादों का वो दरिया भी
सपनों की कश्ती लूट गया
मेरे सब्र का बाँध टूट गया।
डॉ. आशु जैन 09/12/18

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन न...