नया:
क्यों तुमको अब पहले सा प्यार नहीं
क्यों चाँद में अब मेरा दीदार नहीं
क्यों दो नैना मिलकर होते चार नही
सुनो ! तुम्हारा नयापन मुझे स्वीकार नहीं।
क्यों मेरे बिन दिन और रात बेकार नहीं
क्यों मेरे संग भी आता तुम्हे करार नहीं
क्यों आँखे अब करती दिल पर वार नहीं
सुनो ! तुम्हारा नयापन मुझे स्वीकार नहीं।
क्यों मुझपर पहले सा वो एतबार नहीं
क्यों मेरे रंग रूप का वो सत्कार नहीं
क्यों मेरी बातों का चढ़े खुमार नहीं
सुनो ! तुम्हारा नयापन मुझे स्वीकार नहीं।
डॉ. आशु जैन 31/12/18
क्यों तुमको अब पहले सा प्यार नहीं
क्यों चाँद में अब मेरा दीदार नहीं
क्यों दो नैना मिलकर होते चार नही
सुनो ! तुम्हारा नयापन मुझे स्वीकार नहीं।
क्यों मेरे बिन दिन और रात बेकार नहीं
क्यों मेरे संग भी आता तुम्हे करार नहीं
क्यों आँखे अब करती दिल पर वार नहीं
सुनो ! तुम्हारा नयापन मुझे स्वीकार नहीं।
क्यों मुझपर पहले सा वो एतबार नहीं
क्यों मेरे रंग रूप का वो सत्कार नहीं
क्यों मेरी बातों का चढ़े खुमार नहीं
सुनो ! तुम्हारा नयापन मुझे स्वीकार नहीं।
डॉ. आशु जैन 31/12/18
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