संग *जीने- मरने* की कसमें थीं
रीति रिवाज थे, रस्में थीं
वो प्रीत का धागा टूट गया
मेरे सब्र का बाँध टूट गया।
साक्षी था वो आसमान
और साक्षी सभी वो तारे थे
जिनके दामन में बैठ के हमने
दिन और रात गुजारे थे।
वो आसमान का तारा भी
मेरी दुआओं में टूट गया
मेरे सब्र का बाँध टूट गया।
वो अग्नि बनी थी साक्षी
जिसके लिए हमने फेरे थे
वचनों में बाँधा था सबने
मैं तुम्हारी थी तुम मेरे थे
कसमो का एक एक मोती
प्रीत की डोर से छूट गया
मेरे सब्र का बाँध टूट गया।
जीवन की आपाधापी में
हम भूल गए एक दूजे को
न याद रहा था कुछ हमको
न याद रहा कुछ भी तुमको
अब यादों का वो दरिया भी
सपनों की कश्ती लूट गया
मेरे सब्र का बाँध टूट गया।
डॉ. आशु जैन 09/12/18
No comments:
Post a Comment