Friday, September 28, 2018

बहाव


जैसे छोड़ती है नदी
अपना अस्तित्व
अपनी पहचान
अपना रंग रूप
अपना सम्मान
अपना जीवन
अपना यौवन
सब कुछ त्यागती है
सागर से मिलने को
नही सुनती
किसी की कोई बात
नही थामती
किसी का हाथ
चलती है निरंतर
अपनी यात्रा पर
डूबने अपने
प्रियतम के आगोश में
लुटा देती है
अपना सर्वस्व
और खो देती है स्वयं को
प्राप्त कर लेती है
पूर्णता
हो जाती है एकाकार
अपने सागर के साथ
मैं भी बही थी
उसी नदी की तरह
तुम्हारे बहाव में
तुम्हारे प्रभाव में
चल पड़ी थी
बिना सोचे
क्या होगा आगे
छोड़ दिया अपना
सब कुछ
और पा लिया
तुम्हें
हो गई एकाकार तुमसे
और प्राप्त कर ली
पूर्णता
क्योंकि
मेरा सागर
सिर्फ तुम ही हो।
डॉ आशु जैन

Thursday, September 27, 2018

ज़िन्दगी क्या है


यही क्षण, यही पल, इसी समय यही वर्तमान ज़िन्दगी है।
क्योंकि आने वाला पल भविष्य है और बीता हुआ पल अतीत। ज़िन्दगी ज़िन्दादिली का नाम है
जो ज़िंदादिल है वही ज़िंदा है जो जीना नही जानते वे मरे हुए के समान है। हम मौत की बात करें ही क्यों जब बात ज़िन्दगी की चल रही है, मौत तो शाश्वत है ही पहले ज़िन्दगी का जश्न तो मना लो फिर मौत तो आनी ही है।
ज़िन्दगी एक जश्न है
जिसमे न जाने कितने प्रश्न है
हर अनसुलझे सवाल का जवाब है जिंदगी
जरा गौर से देखो खुली किताब है ज़िन्दगी।
जन्म से ही उम्र का साथ मिल जाता है और उस उम्र के साथ न जाने कितने अनुभव, भावनाये, ख्वाहिशें, कोशिशें, सब कुछ पलता और चलता रहता है।
 जब कठिन लगे ज़िन्दगी का प्रश्नपत्र
तो जियो वर्तमान में छोड़कर सारी चिंता और फिक्र ।
क्योंकि ज़िन्दगी वर्तमान है।
डॉ आशु जैन

Wednesday, September 26, 2018

जीवन


मेरे जीवन में तुम्हारे सिवा कुछ भी नही
तुम्हारा जीवन मेरे बिना भी हसीन क्यों है
तुमने ही तो आगे बढ़कर हाथ थामा था मेरा
फिर मेरे बिना भी तुम्हारी महफ़िल रंगीन क्यों है
इश्क तुमने भी किया मैने भी किया
फिर मेरे ही प्यार की ये तौहीन क्यों है
चले तो दोनों थे आसमान छूने के लिए
फिर मेरे हिस्से में बंजर जमीन क्यों है
दिल टूटा है मेरा तो चोट तुम्हे भी लगी होगी
फिर मेरे ही दिल का माहौल गमगीन क्यों है
आंखों से आंसू तो तुम्हारे भी बहे ए 'अश्क'
लेकिन मेरी आंखो का पानी नमकीन क्यों है
डॉ आशु जैन

Tuesday, September 25, 2018

डर


आज फिर कोमल को मम्मी का फ़ोन आया जल्दी घर आने के लिए और कोमल अपना बैग लेकर जल्दी जल्दी घर की ओर कदम बढ़ाने लगी।
रास्ते मे अभी तक की सारी बातें आंखों के सामने चलायमान होने लगीं।
मन अनेकों आशंकाओ से घिर उठा। न जाने इस बार क्या होगा कहीं एक बार फिर से वो...... नहीं ..... प्लीज भगवान इस बार नही, बहुत हुआ अब और नहीं। अनगिनत ख्याल, गुस्सा, अपमान मन में दबाये हुए वो तेज़ कदमों से घर की ओर बढ़ रही थी। घर पहुची ही थी कि सरला चाची दरवाजे पे ही खड़ी थी, देखते ही बोली ये लो आ गई महारानी। जरा पार्लर हो आती थोड़ा सज संवर कर आती। बड़ी मुश्किल से लड़के वालों ने मिलने के लिए हाँ कहा है।
सुनकर उसका मन आत्मग्लानि से भर उठा। चीख चीख कर कहना चाहती थी कि अगर वो सुंदर नहीं है तो इसमें उसकी क्या गलती है? नही मिलना उसे किसी से, नही करनी शादी। लेकिन अपनी भावनाओं को एक बार फिर दिल मे दबाये अपने कमरे की ओर चली।
माँ ने कहा बेटी तैयार हो जा वो लोग आते ही होंगे।
हाँ माँ। कहकर वह तैयार होने लगी।
इंतजार खत्म हुआ और एक बड़ी सी लाल रंग की कार घर के आगे आकर रुकी और मेहमान घर में प्रविष्ट हुए।
 आकर्षित करने की क्षमता रखता हुआ मध्यम कद काठी का गोरा सा लड़का बड़ी शालीनता से सोफे पे बैठ गया।
कोमल का मन डर एवं आशंकाओ से कांप रहा था। आखिर कोमल सामने आई और पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी बातें रखी। हालांकि ये उसके लिए कोई नई बात नही थी और वह शायद उनका जवाब भी जानती थी लेकिन फिर भी आत्मविश्वास में कोई कमी नही आई क्योंकि कोमल पढ़ी लिखी ,सर्व गुण सम्पन्न  एवं समझदार लड़की थी। हाल ही में उसने यूपीएससी का मेंस दिया था। सारी बाते हुई और वो लोग चले गए।
अगले दिन उनका फ़ोन आया। कोमल का दिल डर के मारे जोरों से धड़क रहा था लेकिन जवाब इस बार कुछ अलग था। लड़के ने कहा उसे लड़की पसन्द है और किसी को इस बात पर विश्वास नही हो रहा था क्योंकि लड़का उच्च पद पर आसीन था। उसने स्पष्ट किया कि वह आज के जमाने का है और उसे सुंदरता से ज्यादा गुणों की आवश्यकता है। सुनते ही कोमल का मन भयमुक्त हुआ और वो समझ गई कि समय बदल रहा है, लोगों की मानसिकता बदल रही है। नए युग की नई सोच ने उसके डर का अंत कर दिया और उसके चेहरे पर मुस्कुराहट फैल गई।
डॉ आशु जैन 'अश्क'

Monday, September 24, 2018

अक्षर

जब लड़खड़ाते
जज्बातों से
 टूटते हुए
अल्फाज़ो से
तुमने अपने प्यार का
वास्ता देकर
मेरा रास्ता रोका था
मैं चाहकर भी
नही रोक पाई
खुद को
न जाने से
साल दर साल
गुजरते हुए लम्हो में
हर सोच में
हर अक्षर में
आज भी तुम हो
तुम्हारे
टूटे हुए अल्फाज हैं
जिनको जोड़कर
मैं बना लेती हूँ
अपने वाक्य
अपनी रचनाएँ
और हर रचना का
केंद्र होते हो
सिर्फ तुम।
डॉ आशु जैन 'अश्क'

Sunday, September 23, 2018

याद हमें तुम कर लेना

जीवन की उन राहो पर
जब चलते चलते थक जाओ
जब हंसकर मिलते थक जाओ
जब रोते रोते थक जाओ
याद हमें तुम कर लेना
कुछ आँसू कम हो जायेंगे
जब चारों ओर अंधेरा हो
तुमको एकांत ने घेरा हो
जब आस किरन न दिखती हो
जब रोशनी आंखों में चुभती हो
तुम आँखे बंद कर लेना
हम तुमको मिल जायेंगे
कुछ आँसू कम हो जायेंगे
जब सारे तुमसे रूठे हों
सब रिश्ते नाते टूटे हों
जब सारे सच्चे झूठे हों
आंखों से झरने फूटे हों
याद हमे तुम कर लेना
कुछ आंसू कम हो जाएंगे
जब दिल की गलियां सूनी हो
निराशाओं की धूनी हो
अँखियाँ भी सूनी सूनी हो
याद हमें तुम कर लेना
कुछ आँसू कम हो जाएंगे
जब अंधियारा चहुँ ओर मिले
कहीं न कोई फूल खिले
जीवन पथ की बाधाओं में
पैरो में चुभते शूल मिले
तुम एक बार बस कह देना
हम तुमको मिल जायेंगे
कुछ आंसू कम हो जायेगे.....
डॉ आशु जैन 'अश्क'

Wednesday, September 19, 2018

हमसफ़र

मेरी चाहतों का सिलसिला इस तरह चलता रहे,
मेरे दिल में  प्यार तेरा हर समय पलता रहे,
तू कहीं भी रहे दुनिया मे  मेरे ए हमसफर
अहसासों का ये दिया हर सांस में जलता रहे।
तेरी खुशबू मेरी रूह में बस जाए कुछ इस तरह,
कि मेरी हर एक साँस में बस तू मुझे मिलता रहे।
तेरे हरएक ख्वाब को मैं भर लूँ अपनी आंख मैं,
अपना हर एक ख्वाब बनके फूल यूँ खिलता रहे।
ज़िन्दगी तो नाम तेरे कर चुकी हूँ मैं सनम,
ख्वाहिशें हैं हर जनम बस तू मुझे मिलता रहे।
डॉ आशु जैन 'अश्क'

सुनो न .... गणेश


हे गजानन, हे लंबोदर
सुनो न
एक बात कहनी है
क्यों प्रकृति इतनी सूनी है
क्यों तुम्हारी तरह ऊर्जावान नही है
क्यों अब मात पिता का वो सम्मान नही है
बताओ न विघ्नहर्ता,
क्यों गलियाँ सूनी पड़ी हैं,
सूनी गलियों में सिसकियां खड़ी हैं,
एक प्रश्न है मेरा हे गणपति,
क्यों समाज मे चहुँ ओर फैली विकृति
दुनिया में फैला पापाचार,
मिटाने आओ और लो अवतार,
हे गौरी पुत्र गणेश,
तुम तो सब जानते हो,
पापियो को पहचानते हो,
उन्हें उनकी करनी का फल दो,
सब्र नही होता अब
आओगे तुम कब,
आंखे बंद है दिल उदास है
मेरे नैनो को गजानन तेरे दरश की प्यास है।
डॉ आशु जैन 

उपहार

उपहार-
निशा लगातार रोये जा रही थी और रजत एक बार फिर उसे मनाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। निशा की निराशा जायज़ थी लेकिन रजत भी मजबूर था क्या नहीं किया उसने निशा की सूनी गोद भरने के लिए लेकिन सब व्यर्थ। कोई डॉक्टर , मंदिर , मस्जिद बाकी नहीं रहा जहाँ उसने माथा न टेका हो लेकिन सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। आज भी वही हुआ शहर के जाने माने चिकित्सक ने भी वही जवाब दिया निशा भीतर ही भीतर घुट रही थी लेकिन आज टूटा हुआ महसूस कर रही थी। रजत अपनी प्रियतमा की हालत देख नहीं पा रहा था कि अचानक कुछ सोचकर उठ खड़ा हुआ और तेजी से बाहर निकल गया इससे पहले कि निशा कुछ पूछ पाती वह आँखों से ओझल हो गया। शाम को जब वह वापस आया तो उसके हाथों में एक नन्ही सी गुड़िया थी जिसे कल कोई सड़क किनारे छोड़ गया था। सारी कागजी कार्यवाही करने में वक्त लगा लेकिन वह अपनी निशा को आज ही जीवन का यह उपहार देना चाहता था। उस नन्ही सी जान को देखकर मानो निशा के जीवन की कालरात्रि सदैव के लिए भोर में बदल गई। यह उसके जीवन का सबसे बहुमूल्य उपहार था।
डॉ आशु जैन 'अश्क'

दूरियाँ/ फ़ासले

न जाने क्यों आज बहुत याद आ रहा है,
जो दिल के करीब था  दूर जा रहा है।
मोहब्बत है कभी प्यार कभी तकरार जायज़ है,
झगड़ के मुझसे वो मन ही मन मुस्कुरा रहा है।
दिलों के मसले बातों से हल नहीं होते,
आँखों ही आँखों से वो मुझे समझा रहा है।
रूठने का हक़ तो दिया ही नहीं उसे मैंने,
मेरी ही गलती है और वो मना रहा है।
इश्क़ में कैसी दूरियां कैसे फ़ासले,
दूर होके वो फिर दिल के करीब आ रहा है।
डॉ आशु जैन 'अश्क'

ख्याल

यूँ तो ख्याल बहुत हैं मेरे मन में, लेकिन एक ख्याल बार बार आता है
तू चाहे अनचाहे मेरे ख्वाबों में चला आता है,
दिल मेरा हर बार बस ये सोचकर रह जाता है,
कि तू नहीं आता बस तेरा ख्याल क्यों आता है
क्या कमी है मेरी मोहब्बत में जो तन्हाई मिली मुझे
बार बार ये सवाल मेरे मन से टकराता है,
जानती हूँ मैं कि बेवफा है तू, पर दिल मेरा क्यों ये मान नहीं पाता है,
तेरे होंठो पे तो हंसी सजा दी मैंने
तू क्यों मेरे दिल को इस तरह रुलाता है,
रुसवाइयों का सिलसिला जारी है 'अश्क'
इक बार जो चला जाये वापस नहीं आता है।

डॉ आशु जैन

क्षमा दान

*क्षमा* दान है महादान,
है सचमुच ये पुण्य का काम,
लेकिन क्षमा करूँ कैसे, अपने दर्द कहूँ कैसे।
माफ़ी वीरों की शान है,
जो माफ़ करे वो महान है,
मैं वो वीर बनूँ कैसे,
सबको माफ़ करूँ कैसे।
जिनने मुझको तड़पाया है,
आंसू दिए , रुलाया है,
मैं अब धीर धरूँ कैसे
सबको माफ़ करूँ कैसे।
गैर नहीं वो अपने हैं,
काली रातों के सपने हैं,
दिल की पीर हरु कैसे
सबको माफ़ करूँ कैसे।
वो जख्म बड़े ही गहरे हैं
जिन पर यादों के पहरे है,
मैं वो जख्म भरूँ कैसे
और सबको माफ़ करूँ कैसे।
काया तो पहले भेद गए
वो अंतर्मन तक छेद गए
मन के वो घाव भरूँ कैसे और सबको माफ़ करूँ कैसे।
देखूँ खुदको घिन आती है
उनकी सूरत दिख जाती है
शीशे में अक्स  धरूँ कैसे
मैं सबको माफ़ करूँ कैसे।
मैं सबको.......

डॉ आशु जैन

भवँरा

कली कली पे भंवरा डोले, अपने मन की बात ये बोले, करता है मधुर गुंजार, कली मैं तुमसे करता प्यार।
सुनकर कली शरमा गई, भँवरे की बात पे भरमा गई, उसके मन में भी है प्यार, पर कहने में डरती यार।
भँवरे ने फिर जोर दिया, मुझसे कैसी शर्म हया,
मै तेरा दीवाना हूँ तुम भी मेरी बन जाओ पिया।
माना कि भंवरा चंचल है, पर कली के मन में हलचल है, प्यार तो उससे करती है पर खोने से वो डरती है।
प्यार में ये तकरार हुई, आखिर कली की हार हुई, भंवरा जीत गया फिर से, कली बनी फूल इस मधुकर से।
फिर,
जिसका डर था वही हुआ,
रस पीकर वह भ्रमर गया, फूल याद में उसकी मुरझाया, फिर प्यार का कोई गीत नहीं गाया नहीं गाया।
डॉ आशु जैन

हिंदी

मैं जब जब साँस लेती हूँ वो हिंदी में ही आती है,
बिना हिंदी मेरी साँसे जाने क्यों थम सी जाती हैं।
मैं जब भी आह भरती हूँ वो हिंदी में निकलती है,
बताओ आप अब इसमें कहाँ पर मेरी गलती है।
आँखों से मेरे आंसू भी हिंदी में बरसते हैं,
आजकल ये कान हिंदी को तरसते हैं।
बताना दर्द अपना हिंदी में ही अच्छा लगता है,
कोई बोले जो हिंदी तो बड़ा सच्चा सा लगता है।
खुशियो की मेरी चाबी बस ये मेरी हिंदी है,
बिना इसके मेरा लेखन तो बस फिर चिन्दी चिन्दी है।
कि मैं जब मौन होती हूँ तो हिंदी में ही होती हूँ,
कि जब मैं टूट जाती हूँ तो हिंदी में ही रोती हूँ।
मेरी हर मुस्कराहट का नया सोपान है हिंदी,
मेरी हर सुबह है हिंदी मेरी हर शाम है हिंदी।
कि दिल जब भी मेरा टूटा वो हिंदी में ही है टूटा,
करें क्या बात ग़ैरों की इसे तो अपनों ने ही लूटा।
मेरी पूजा मेरी श्रद्धा मेरा भगवान है हिंदी,
नए युग की नई शुरुआत का पैगाम है हिंदी।


सुनकर बातें मेरी हिंदी हँसकर बोली,
ले लगा ले अपने माथे पे ये मेरी रोली।
मेरी रोली ही जग में तेरा नाम करेगी,
हिंदी भाषा ही तेरी पहचान बनेगी।
मूरख हैं वो अभी नींद से नहीं है जागे,
मुझे छोड़ जो किसी गैर के पीछे भागे।
जब जागेंगे 'अश्क' बहुत वो पछतायेंगे,
यहाँ के न वो वहाँ के होके रह पाएंगे।
डॉ आशु जैन

विघ्नहर्ता

हे विघ्नहर्ता गणेश,
आओ न फिर से हरो सभी के क्लेश,
हे मुक्तिदायक गजानन,
बचाओ नन्ही सी परियों का दामन,
हे अन्तर्यामी लंबोदर,
बना दो सबके मन में दया ममता का घर,
हे ममतामयी गौरी नंदन,
भर दो मन मे प्रेम का सघन वन,
सुनो हे सृष्टि के पालनहार
एक बार फिर से लो अवतार,
आ जाओ दुखियों के दुख हरने,
आ जाओ हमारा भला करने।
आ जाओ आ जाओ......
डॉ आशु जैन

Tuesday, September 18, 2018

विसर्जन

गुस्से में रिया ने सारा दिन खाना नहीं खाया, रितिक भी उसे मनाये बिना भारी मन से ऑफिस चला गया। इधर रिया सारा दिन घर में घुटती रही , मन ही मन कभी रितिक को कभी खुद को कोसती रही। कभी सोचती क्या चला जाता अगर रितिक खुद उससे बात करने की पहल कर लेता फिर कभी सोचती कि मेरी ही गलती थी मुझे सासु माँ से ऊंची आवाज में बात नही करनी चाहिए थी और अगर कर भी ली तो माफी मांग के सारी बात को ठीक कर सकती थी, इसी उहापोह में सारा दिन निकल गया। वैसे तो रितिक दिन में 2-3 बार फ़ोन करके हालचाल पूछ लेते थे लेकिन आज एक भी फ़ोन नहीं आया। इधर रिया की बेचैनी और गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था वह खुद के ही सवालो जवाबों की मझधार में खुद को उलझा हुआ महसूस कर रही थी। इतने में दरवाजे की घंटी ने उसकी तंद्रा भंग की उसने दरवाजा खोला रितिक सामने खड़े थे लेकिन कुछ बोले नही चुपचाप जाके सोफे पे बैठ गए। रिया के मन की उधेड़बुन अब धीरे धीरे अपराधबोध में बदल रही थी लेकिन वह अब भी गुस्सा थी क्योंकि उसने सारा दिन कुछ नही खाया और रितिक ने एक बार भी उससे नही पूछा। रात के खाने के समय वह सबको परोसने के बाद चुपचाप अपने कमरे में चली गई इतने में रितिक भोजन की थाल लिए रिया के पास जाकर बैठ गए और कहा तुमने आज सारा दिन खाना क्यों नही खाया? इतना सुनते ही रिया फूट फूट कर लिपट कर रोने लगी। उसका गुस्सा, अपराधबोध, अबोलापन सब उसके आंसुओं के साथ विसर्जित हो गया।। 

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन न...