जैसे छोड़ती है नदी
अपना अस्तित्व
अपनी पहचान
अपना रंग रूप
अपना सम्मान
अपना जीवन
अपना यौवन
सब कुछ त्यागती है
सागर से मिलने को
नही सुनती
किसी की कोई बात
नही थामती
किसी का हाथ
चलती है निरंतर
अपनी यात्रा पर
डूबने अपने
प्रियतम के आगोश में
लुटा देती है
अपना सर्वस्व
और खो देती है स्वयं को
प्राप्त कर लेती है
पूर्णता
हो जाती है एकाकार
अपने सागर के साथ
मैं भी बही थी
उसी नदी की तरह
तुम्हारे बहाव में
तुम्हारे प्रभाव में
चल पड़ी थी
बिना सोचे
क्या होगा आगे
छोड़ दिया अपना
सब कुछ
और पा लिया
तुम्हें
हो गई एकाकार तुमसे
और प्राप्त कर ली
पूर्णता
क्योंकि
मेरा सागर
सिर्फ तुम ही हो।
डॉ आशु जैन