Wednesday, September 19, 2018

भवँरा

कली कली पे भंवरा डोले, अपने मन की बात ये बोले, करता है मधुर गुंजार, कली मैं तुमसे करता प्यार।
सुनकर कली शरमा गई, भँवरे की बात पे भरमा गई, उसके मन में भी है प्यार, पर कहने में डरती यार।
भँवरे ने फिर जोर दिया, मुझसे कैसी शर्म हया,
मै तेरा दीवाना हूँ तुम भी मेरी बन जाओ पिया।
माना कि भंवरा चंचल है, पर कली के मन में हलचल है, प्यार तो उससे करती है पर खोने से वो डरती है।
प्यार में ये तकरार हुई, आखिर कली की हार हुई, भंवरा जीत गया फिर से, कली बनी फूल इस मधुकर से।
फिर,
जिसका डर था वही हुआ,
रस पीकर वह भ्रमर गया, फूल याद में उसकी मुरझाया, फिर प्यार का कोई गीत नहीं गाया नहीं गाया।
डॉ आशु जैन

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