Wednesday, September 19, 2018

सुनो न .... गणेश


हे गजानन, हे लंबोदर
सुनो न
एक बात कहनी है
क्यों प्रकृति इतनी सूनी है
क्यों तुम्हारी तरह ऊर्जावान नही है
क्यों अब मात पिता का वो सम्मान नही है
बताओ न विघ्नहर्ता,
क्यों गलियाँ सूनी पड़ी हैं,
सूनी गलियों में सिसकियां खड़ी हैं,
एक प्रश्न है मेरा हे गणपति,
क्यों समाज मे चहुँ ओर फैली विकृति
दुनिया में फैला पापाचार,
मिटाने आओ और लो अवतार,
हे गौरी पुत्र गणेश,
तुम तो सब जानते हो,
पापियो को पहचानते हो,
उन्हें उनकी करनी का फल दो,
सब्र नही होता अब
आओगे तुम कब,
आंखे बंद है दिल उदास है
मेरे नैनो को गजानन तेरे दरश की प्यास है।
डॉ आशु जैन 

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