Wednesday, September 19, 2018

दूरियाँ/ फ़ासले

न जाने क्यों आज बहुत याद आ रहा है,
जो दिल के करीब था  दूर जा रहा है।
मोहब्बत है कभी प्यार कभी तकरार जायज़ है,
झगड़ के मुझसे वो मन ही मन मुस्कुरा रहा है।
दिलों के मसले बातों से हल नहीं होते,
आँखों ही आँखों से वो मुझे समझा रहा है।
रूठने का हक़ तो दिया ही नहीं उसे मैंने,
मेरी ही गलती है और वो मना रहा है।
इश्क़ में कैसी दूरियां कैसे फ़ासले,
दूर होके वो फिर दिल के करीब आ रहा है।
डॉ आशु जैन 'अश्क'

No comments:

Post a Comment

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन न...