Wednesday, September 19, 2018

उपहार

उपहार-
निशा लगातार रोये जा रही थी और रजत एक बार फिर उसे मनाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। निशा की निराशा जायज़ थी लेकिन रजत भी मजबूर था क्या नहीं किया उसने निशा की सूनी गोद भरने के लिए लेकिन सब व्यर्थ। कोई डॉक्टर , मंदिर , मस्जिद बाकी नहीं रहा जहाँ उसने माथा न टेका हो लेकिन सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। आज भी वही हुआ शहर के जाने माने चिकित्सक ने भी वही जवाब दिया निशा भीतर ही भीतर घुट रही थी लेकिन आज टूटा हुआ महसूस कर रही थी। रजत अपनी प्रियतमा की हालत देख नहीं पा रहा था कि अचानक कुछ सोचकर उठ खड़ा हुआ और तेजी से बाहर निकल गया इससे पहले कि निशा कुछ पूछ पाती वह आँखों से ओझल हो गया। शाम को जब वह वापस आया तो उसके हाथों में एक नन्ही सी गुड़िया थी जिसे कल कोई सड़क किनारे छोड़ गया था। सारी कागजी कार्यवाही करने में वक्त लगा लेकिन वह अपनी निशा को आज ही जीवन का यह उपहार देना चाहता था। उस नन्ही सी जान को देखकर मानो निशा के जीवन की कालरात्रि सदैव के लिए भोर में बदल गई। यह उसके जीवन का सबसे बहुमूल्य उपहार था।
डॉ आशु जैन 'अश्क'

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