Saturday, December 8, 2018

अधूरा प्यार

अधूरा प्यार:
एक वार
दोनों घायल
इश्क का
चढा बुखार।
एक वार
प्रीत में डूबे
दो दिल
और नैना चार।
एक वार
धोखा फरेब
दिल छलनी
आंखें बेज़ार
एक वार
टूटती साँसे
बुझती ज़िन्दगी
अधूरा प्यार।
©डॉ. आशु जैन 08/12/18

हादसा

मेरे साथ एक हसीन हादसा हो गया
तू मुझे मिला नया फलसफा हो गया
चल रहे थे दोनो मगर मंजिलें तो थी जुदा
नजर -ए- दीदार क्या हुआ एक रास्ता हो गया
दुनिया की भीड़ में सब हैं अनजाने मगर
तुमसे ही क्यों अपनेपन का वास्ता हो गया
कितने करीब थे मेरे रिश्ते जहान में
तू क्या मिला सबसे फासला हो गया
आया जो तू तो ख्वाबों का सिलसिला कुछ यूँ चला
मेरी हकीकतों का मंज़र ख़ाकसा हो गया।
डॉ. आशु जैन 07/12/18

पहाड़

पहाड़ से तुम
नदी सी मैं
खड़े से तुम
बही सी मैं
कठोर से तुम
सरल सी मैं
अटल से तुम
शिथिल सी मैं
बेपरवाह तुम
मचलती सी मैं
मजबूत से तुम
तड़पती सी मैं
गंभीर से तुम
चहकती सी मैं
रौबदार तुम
महकती सी मैं
शांत वीर से तुम
कलकल सी मैं
धैर्यवान से तुम
हलचल सी मैं
फिर भी
मुझमें हो तुम
तुममें हूँ मैं।

©डॉ. आशु जैन 07/12/18

Saturday, December 1, 2018

मुक्ति:


वे कलियाँ देखो मुक्त हो गईं
गिरीं पेड़ से कभी कहीं।
जल बादल भी तब मुक्त हो गया
जब फटा धरा पे कभी कहीं
उन्मुक्त हवा वो मुक्त हो गई
थी उठी ज्वार के साथ कभी
चेतन भी तब मुक्त हो गया
जब उड़ा देह से दूर कहीं।
डॉ. आशु जैन 30/11/18

अर्ज़ी


मेरी अर्ज़ी मेरे हमदम मेरे दीवाने तू सुन ले
देख अब और न तड़पा, तू आके अब मुझे मिल ले।
कि मैं गोता लगाती हूँ, तेरी यादों के दरिया में
छोड़ दे तू भंवर लहरें, किनार-ए-तीर तू चुन ले।
हसरतों को मेरे दिल की, कहाँ अब चैन मिलता है
मज़ा आ जाए कानों को, तेरी आवाज़ जो सुन ले।
कि दुनिया ने तो बोये हैं, हर तरफ बीज नफरत के
चलो हम आज नफरत से प्यार के फूल कुछ चुन लें।
गूंजती हैं कि तन्हाई में चीखें और चीत्कारें
चलो अब मौन हो जाएं और खामोशी को सुन लें।
ख्वाहिशें भी अधूरी हैं, फ़क़त हम भी अधूरे हैं
चलो हम एक होने नए कुछ ख्वाब ही बुन लें।
डॉ. आशु जैन 01/12/18

मीत

वो प्रीत का दामन छोड़ गया
वो मीत मेरा दिल तोड़ गया
जब चारों ओर अंधेरा था
वो भी हमसे मुँह मोड़ गया।
वो बात हमारी करता था
यादों में तारे गिनता था
जब दूर किनारा पाया तो
मझधार में हमको छोड़ गया।
तब दिन हम थे और रात हमीं
सावन भी हम बरसात हमीं
जब रात अमावस की आई
वो बीच रात में छोड़ गया।
वो हरदम साथ चला करता
दिल में भी प्यार पला करता
जब साथ नहीं दे पाया तो
वो हाथ हमारा छोड़ गया।
वो मेरी दुनिया था पूरी
मैं उसकी पूरी दुनिया थी
मेरी दुनिया तो छोड़ी ही
पर ये दुनिया भी छोड़ गया
वो प्रीत का दामन छोड़ गया
वो मीत मेरा दिल तोड़ गया।
डॉ. आशु जैन 28/11/18

सखी

सुनो,
जिस दिन
पहली बार
तुमने मेरा हाथ थामकर
मेरी माँग में
सिन्दूर भरा था
उस पल से
हाँ उसी क्षण से
मैं तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी
होके रह गई थी
सारे रिश्ते छोड़ दिए
पीछे
और खुद
खड़ी हो गई
तुम्हारे साथ
अपने सारे रिश्तो
को तुममें ढूंढा
और पा भी लिया
तुममे सबको
लेकिन
तुम जानते हो?
उन सारे रिश्तों में
पीछे छूट गईं थीं
बचपन की सखियाँ
जिन्हें
चाहकर भी
तुममें
नहीं
पा पाती हूँ
मैं
क्योंकि
तुम्हें ये
बचपना लगता है
तुम्हें कैसे समझाऊँ
ये बचपना ही
मेरा जीवन है।
डॉ. आशु जैन 28/11/18

ग़लतफ़हमी

गलतफहमियों से अट गए रिश्ते
उधड़े , टूटे, फट गए रिश्ते,
सब चलते थे साथ साथ पर
जाने कैसे कट गए रिश्ते।
भाई भाई का दुश्मन हो गया
गाजर घास से पट गए रिश्ते
भ्रम की चारों ओर दीवारें
दीवारों में ही घुट गए रिश्ते।
क्या सगा क्या सौतेला था
खून- खून के लुट गए रिश्ते।
कभी जुदा न हो सकते थे
वे भी देखो मिट गए रिश्ते।
पी कर भ्रम का घोर हलाहल
घिसट घिसट कर मरते रिश्ते
सांस उन्हें अब ले लेने दो
सिमट सिमट कर तरसे रिश्ते।
मत बनने दो बोझ उन्हें
हैं प्यारे प्यारे हल्के रिश्ते
तोड़ो भ्रम की ये दीवारें
खिलखिला दे फिर से रिश्ते।
डॉ. आशु जैन 26/11/18

मजा

आज बारिश में भीगने का मजा आ गया
आंखों में आंसुओं का जलजला आ गया
जी भर के भीगे, जी भर के रोये
बेजार रोने का मजा आ गया।
भरी बरसात और तेरी याद, वाह!!
दोनों के साथ होने का मजा आ गया।
तेरी यादें अक्सर आंखे नम किया करतीं थीं
तेरी यादों को भिगोने का मजा आ गया।
हर पल रोया है दिल, तुझे खोने के बाद
आज यादों में खोने का मजा आ गया।
मैं तुझे ढूँढा करती थी बाहर हर जगह
आज खुद में तेरे होने का मजा आ गया।
पहले तेरी बातें इधर उधर की लगती थीं
आज बातों की कड़ियाँ पिरोने का मजा आ गया।
अब तलक अकेली थी मैं तन्हाइयों से घिरी
सुनसान सड़कों पे तेरे साथ होने का मजा आ गया
जिस्म तो बने ही हैं जुदा होने के लिए
रूह से रूह के साथ होने का मजा आ गया।
डॉ. आशु जैन 24/11/18

तेरे-मेरे


तेरे-मेरे का फर्क मिटाकर
हम सब हो गए एक
बुरे काज सब छोड़-छाड़ कर
काम कर रहे नेक
धर्म अनेकों फैले पर
सब राह दिखाते एक
लाख हमारे उपरवाले,
ईसा राम सब एक।
ऐसा सुंदर स्वप्न सलोना
आया था कल रात
आंख खुली तो पता चला
बस सपने की थी बात।
कल से बस मैं सोच रही,
ये सपना सच हो जाए
राम रहीम तो एक ही हैं,
हिन्दू मुस्लिम मिल जाएं।
ईश्वर ने न बाँटा हमको,
हम खुद ही बँट केगए
गैरों ने न लूटा हमको,
हम अपनों से लुट गए।
आओ मिलकर हम सब
मेरा ये सपना सच कर दें
तेरे-मेरे का भेद मिटाकर
दिल में एक ही रंग भर दें।
 न कोई मुस्लिम, न कोई हिन्दू
 न कोई मैं- मैं, न कोई तू -तू
 एक ही वेश, एक ही परिवेश
 दुनिया में सुंदरतम होगा
 हमारा भारत देश।।।
 डॉ. आशु जैन 25/11/18

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन न...