सुनो,
जिस दिन
पहली बार
तुमने मेरा हाथ थामकर
मेरी माँग में
सिन्दूर भरा था
उस पल से
हाँ उसी क्षण से
मैं तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी
होके रह गई थी
सारे रिश्ते छोड़ दिए
पीछे
और खुद
खड़ी हो गई
तुम्हारे साथ
अपने सारे रिश्तो
को तुममें ढूंढा
और पा भी लिया
तुममे सबको
लेकिन
तुम जानते हो?
उन सारे रिश्तों में
पीछे छूट गईं थीं
बचपन की सखियाँ
जिन्हें
चाहकर भी
तुममें
नहीं
पा पाती हूँ
मैं
क्योंकि
तुम्हें ये
बचपना लगता है
तुम्हें कैसे समझाऊँ
ये बचपना ही
मेरा जीवन है।
डॉ. आशु जैन 28/11/18
जिस दिन
पहली बार
तुमने मेरा हाथ थामकर
मेरी माँग में
सिन्दूर भरा था
उस पल से
हाँ उसी क्षण से
मैं तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी
होके रह गई थी
सारे रिश्ते छोड़ दिए
पीछे
और खुद
खड़ी हो गई
तुम्हारे साथ
अपने सारे रिश्तो
को तुममें ढूंढा
और पा भी लिया
तुममे सबको
लेकिन
तुम जानते हो?
उन सारे रिश्तों में
पीछे छूट गईं थीं
बचपन की सखियाँ
जिन्हें
चाहकर भी
तुममें
नहीं
पा पाती हूँ
मैं
क्योंकि
तुम्हें ये
बचपना लगता है
तुम्हें कैसे समझाऊँ
ये बचपना ही
मेरा जीवन है।
डॉ. आशु जैन 28/11/18
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