Saturday, December 1, 2018

तेरे-मेरे


तेरे-मेरे का फर्क मिटाकर
हम सब हो गए एक
बुरे काज सब छोड़-छाड़ कर
काम कर रहे नेक
धर्म अनेकों फैले पर
सब राह दिखाते एक
लाख हमारे उपरवाले,
ईसा राम सब एक।
ऐसा सुंदर स्वप्न सलोना
आया था कल रात
आंख खुली तो पता चला
बस सपने की थी बात।
कल से बस मैं सोच रही,
ये सपना सच हो जाए
राम रहीम तो एक ही हैं,
हिन्दू मुस्लिम मिल जाएं।
ईश्वर ने न बाँटा हमको,
हम खुद ही बँट केगए
गैरों ने न लूटा हमको,
हम अपनों से लुट गए।
आओ मिलकर हम सब
मेरा ये सपना सच कर दें
तेरे-मेरे का भेद मिटाकर
दिल में एक ही रंग भर दें।
 न कोई मुस्लिम, न कोई हिन्दू
 न कोई मैं- मैं, न कोई तू -तू
 एक ही वेश, एक ही परिवेश
 दुनिया में सुंदरतम होगा
 हमारा भारत देश।।।
 डॉ. आशु जैन 25/11/18

No comments:

Post a Comment

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन न...