पहाड़ से तुम
नदी सी मैं
खड़े से तुम
बही सी मैं
कठोर से तुम
सरल सी मैं
अटल से तुम
शिथिल सी मैं
बेपरवाह तुम
मचलती सी मैं
मजबूत से तुम
तड़पती सी मैं
गंभीर से तुम
चहकती सी मैं
रौबदार तुम
महकती सी मैं
शांत वीर से तुम
कलकल सी मैं
धैर्यवान से तुम
हलचल सी मैं
फिर भी
मुझमें हो तुम
तुममें हूँ मैं।
©डॉ. आशु जैन 07/12/18
नदी सी मैं
खड़े से तुम
बही सी मैं
कठोर से तुम
सरल सी मैं
अटल से तुम
शिथिल सी मैं
बेपरवाह तुम
मचलती सी मैं
मजबूत से तुम
तड़पती सी मैं
गंभीर से तुम
चहकती सी मैं
रौबदार तुम
महकती सी मैं
शांत वीर से तुम
कलकल सी मैं
धैर्यवान से तुम
हलचल सी मैं
फिर भी
मुझमें हो तुम
तुममें हूँ मैं।
©डॉ. आशु जैन 07/12/18
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