Saturday, December 1, 2018

मुक्ति:


वे कलियाँ देखो मुक्त हो गईं
गिरीं पेड़ से कभी कहीं।
जल बादल भी तब मुक्त हो गया
जब फटा धरा पे कभी कहीं
उन्मुक्त हवा वो मुक्त हो गई
थी उठी ज्वार के साथ कभी
चेतन भी तब मुक्त हो गया
जब उड़ा देह से दूर कहीं।
डॉ. आशु जैन 30/11/18

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