Saturday, December 1, 2018

अर्ज़ी


मेरी अर्ज़ी मेरे हमदम मेरे दीवाने तू सुन ले
देख अब और न तड़पा, तू आके अब मुझे मिल ले।
कि मैं गोता लगाती हूँ, तेरी यादों के दरिया में
छोड़ दे तू भंवर लहरें, किनार-ए-तीर तू चुन ले।
हसरतों को मेरे दिल की, कहाँ अब चैन मिलता है
मज़ा आ जाए कानों को, तेरी आवाज़ जो सुन ले।
कि दुनिया ने तो बोये हैं, हर तरफ बीज नफरत के
चलो हम आज नफरत से प्यार के फूल कुछ चुन लें।
गूंजती हैं कि तन्हाई में चीखें और चीत्कारें
चलो अब मौन हो जाएं और खामोशी को सुन लें।
ख्वाहिशें भी अधूरी हैं, फ़क़त हम भी अधूरे हैं
चलो हम एक होने नए कुछ ख्वाब ही बुन लें।
डॉ. आशु जैन 01/12/18

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