Monday, January 20, 2020

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन नौकरी के नाम पे पसीने छूट जाते हैं। यहाँ मीता ने अपनी जिंदगी के दस वर्ष रमेश के घर को सजाने में और उसके परिवार के नाम पे न्यौछावर कर दिए थे। कभी कभी ये सोचकर वह गर्व से झूम उठती थी लेकिन आज जैसे किसी ने उसे अंदर तक हिला कर रख दिया। उसकी जड़ों ने जैसे यकायक उसका साथ ही छोड़ दिया जैसे उसकी साँस दिल और गले के बीच ही कहीं अटक कर रह गई। वह उस समय तो कुछ नहीं कह सकी लेकिन मन ही मन कुछ फैसले ले चुकी थी। अगले दिन सुबह उठते ही साथ उसने रमेश को अपना फैसला सुनाया कि अब वह नौकरी करना चाहती है,सुनकर रमेश अचकचा गया और बोला- यूँ अचानक? मीता आत्मविश्वास से बोली कि हाँ, जीवन के दस वर्ष व्यर्थ कर दिए अब और नहीं। कई कंपनियों में बायो डाटा भेजा था एक जगह से साक्षात्कार के लिए बुलाया है आज ही निकलना है। रमेश को जैसे किसी ने आसमान से धरातल पर पटक दिया हो। एक ही मिनट में उसने सोच लिया कि घर का क्या होगा? बच्चों की देखभाल, परिवार का ख्याल मीता के सिवा कोई नहीं रख सकता। उसने मीता से विनती की कि वो नौकरी न करे , और अपनी कही हुई बात के लिए शर्मिंदा होते हुए माफी माँगी। अब जाके मीता को आराम मिला। मिले भी क्यों न आखिर उसने अपने स्वाभिमान की रक्षा जो कर ली थी।
डॉ. आशु जैन 16/04/19

महावीर

सुखी रहें सब जीव जगत के
ऐसी समता कहाँ से लाऊँ,
हर पाऊँ सबकी बाधाएं
ऐसी क्षमता कहाँ से लाऊँ
सब जीवों पर करूणा बरसे
ऐसी ममता कहाँ से लाऊँ
सत्य अहिंसा हँस के पालूँ
वो प्रसन्नता कहाँ से लाऊँ?
कभी किसी का दिल न दुखाऊँ
वो समानता कहाँ से लाऊँ
ध्यान समाधि में बह जाऊँ
वो गहनता कहाँ से लाऊँ?
पाप कर्म सब नष्ट कर सकूँ
वो पावनता कहाँ से लाऊँ
मैं भी महावीर बन जाऊँ
वो महानता कहाँ से लाऊँ।

डॉ. आशु जैन 17/04/19

आभूषण

न दिन में चैन, न रात में चैना
देखन तोखों तरसें नैना
फिरूं मैं मारी पाऊँ कहीं न
का सखि साजन! न सखि गहना।

हृदय हुआ है बेकल बेकल
दिन रात बहें आँखों से अश्रु जल
मिले जो तू तो बढ़े हृदयबल
का सखि साजन! न सखि पायल।

मिला जो तू तो भूली सोना
जमकर नाची अपने अँगना
रोना छोड़ के सीखी हँसना
का सखि साजन! न सखि कँगना।

नजर लगे न तू है काला
खुशी से मुँह पे जड़ गया ताला
तू है मेरे मय का प्याला
का सखि साजन! न सखि माला।

कमर के चारों ओर तू हरदम
छुए तो लगे कि छिड़ गई सरगम
चलूँ तो बढ़ती सबकी धड़कन
का सखि साजन! न सखि करधन।

डॉ. आशु जैन 

सबसे निराला

वो
सबसे अलग
निराला जगत में
मेरा प्रभु
कन्हैया।

माखनचोर
मटकी फोड़ता
चुराता राधा की
कढाई वाली
चुनरिया।

रचाये
रास लीला
सब गोपियों संग
बनता है
नचैया।

पार
लगाता है
भटकती नाव को
संसार से
खिवैया।

हरता
दुख बाधाएँ
भर देता झोली
मेरा कृष्ण!
हरैया।

डॉ. आशु जैन 30/04/19



तालीम

टूटकर प्यार करने का, ईनाम मिल गया
दिल को एक बेवफा, बेईमान मिल गया।
मिली हमें बेवकूफी की तालीम इस तरह
कि ज़िन्दगी भर रोने का सामान मिल गया।
ख्वाहिशें थीं कि ठंड की सुहानी धूप हो
हमको बादलो से घिरा आसमान मिल गया।
हमने वफ़ा निभाई और जले दोज़ख की आग में
जो बेवफा हुए उन्हें सारा जहान मिल गया।
अब प्यार करने की कभी जुर्रत नहीं करेंगे
वादियों में रास्ता वीरान मिल गया।

डॉ. आशु जैन 03/05/19

मजबूर

किसको बताऊँ कितना मैं मजबूर हो गया हूँ
सुबह से लेकर रात तक मजदूर हो गया हूँ।
चर्चे बड़े हैं मेरे शहर ए तमाम में
कि देखते ही देखते मशहूर हो गया हूँ।
जिनको फ़िकर नहीं थी मेरी पूछते हैं अब
सोचकर इसे मैं मगरूर हो गया हूँ।
आदमी बड़ा नहीं था फ़क़त आदमी ही था
शर्मिंदा थे जो मुझपे उनका ग़ुरूर हो गया हूँ।
सब ओर फैला है जो वो नूर है मेरा
जब खुद में झाँकता हूँ तो बेनूर हो गया हूँ।
डॉ. आशु जैन 01/05/19

तकदीर का खेल

हम
जुदा हुए
तकदीर का खेल
तुमने सोचा
कभी?

वो
था फरेब
प्यार नही था
मैने समझा
अब।

तुमने
हर बार
बहलाया झूठ से
मानती रही
मैं।

अब
ठान लिया
लडूंगी अकेले सब से
रहूँगी साथ
अपने।

डॉ. आशु जैन 30/04/19

अमीर गरीब



जैसे
समुद्र में
मछलियाँ खाती हैं
एक दूसरे
को

वैसे
लीलता है
इस धरा पर
अमीर गरीब
को।

जैसे
करती हैं
कुछ मछलियाँ गन्दगी
तालाब में
रहकर

वैसे
करके हमला
आतंकवादी मानता है
शैतान को
रहबर।

डॉ. आशु जैन 30/04/19

उपाय

मिल न पाय,
कोई उपाय
दिल की लगी
को कैसे बुझाय
अँखियन अँखियन रैना बीते
याद तुम्हारी हमको सताय
तुम्हे न देखे हम मुरझाय
लखियत तुमको मन मुस्काय
हाथ पकड़ लो हम हिल जाय
मिल जाओ तो हम खिल जाय
बहुतई मन को हम समझाय
लाख जतन करे ढूँढे उपाय
कोई उपाय समझ न आय
मन में छटपट बढ़ती जाय
व्याकुल हिय बहुतई घबराए
मिल जाओ तो ठंडक पाय।

डॉ. आशु जैन 08/05/19

तेरा ज़िक्र

ज़िक्र जब जब तेरा मेरी ज़ुबान पे आता है
मेरा तन बदन खिलता है महक सा जाता है।
खुशबू तेरी मेरी बातों से आने लगती है
दिल मेरा जोरों से धड़क सा जाता है।
हम क्यों जुदा हुए कोई जानता नहीं
सोचकर हर बार मेरा मन तड़प सा जाता है।
जब याद आती है वो पहले प्यार की बात
मीठी मुलाकात का शोला भड़क सा जाता है।
क्या तदबीर करूँ कि हो जाए मुलाकात
तुझ तक आने वाला हर रास्ता भटक सा जाता है।
जब चाहूँ तुझे पाना तेरे साथ उम्र बिताना
मेरा ये ख्याल जमाने को खटक सा जाता है।

डॉ. आशु जैन 08/05/19

वो समय

सतयुग से चलते चलते
जो कलयुग में आ पहुंचा है
वो समय ब्रम्ह की वाणी से
गतिमान हुआ न ठहरा है।

वो आगे आगे चलता है
हम छूट कहीं जाते पीछे
बातें बातों में भूल गए
दिल में यादों का पहरा है।

शब्दों के जालों में उलझे
बातों के अर्थ नहीं समझे
उर्दू इंग्लिश सब सीख लिया
पर दिल में बसा ककहरा है।

दिन रात गए सालों गुज़रे
हम टूटे बिखरे फिर निखरे
वक्त बढा हम भी बढ़ गए
अब हर पल नया सुनहरा है।

डॉ. आशु जैन 13/06/19

चाहतें

चाहतों ने अब अपना
घर बदल दिया
उन्होंने भी अपना
हमसफ़र बदल दिया
हम खयालो में भी
उन्ही के डूबे हुए
हमे खबर भी न हुई कि
इस कदर बदल दिया।
नादाँ था दिल मेरा
मासूम था बहुत
पाने को तुझे फिर से
एक बार मचल गया।
किस्से सुनाए हमने
तेरी बेवफ़ाई के
रूठा तो था बहुत मगर
फिर भी सम्भल गया।
अब कश्ती तो एक है
मगर मंजिल हुई जुदा
कि लहरे वही रही
और साहिल बदल गया।

डॉ. आशु जैन 7/06/19

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन न...