मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन नौकरी के नाम पे पसीने छूट जाते हैं। यहाँ मीता ने अपनी जिंदगी के दस वर्ष रमेश के घर को सजाने में और उसके परिवार के नाम पे न्यौछावर कर दिए थे। कभी कभी ये सोचकर वह गर्व से झूम उठती थी लेकिन आज जैसे किसी ने उसे अंदर तक हिला कर रख दिया। उसकी जड़ों ने जैसे यकायक उसका साथ ही छोड़ दिया जैसे उसकी साँस दिल और गले के बीच ही कहीं अटक कर रह गई। वह उस समय तो कुछ नहीं कह सकी लेकिन मन ही मन कुछ फैसले ले चुकी थी। अगले दिन सुबह उठते ही साथ उसने रमेश को अपना फैसला सुनाया कि अब वह नौकरी करना चाहती है,सुनकर रमेश अचकचा गया और बोला- यूँ अचानक? मीता आत्मविश्वास से बोली कि हाँ, जीवन के दस वर्ष व्यर्थ कर दिए अब और नहीं। कई कंपनियों में बायो डाटा भेजा था एक जगह से साक्षात्कार के लिए बुलाया है आज ही निकलना है। रमेश को जैसे किसी ने आसमान से धरातल पर पटक दिया हो। एक ही मिनट में उसने सोच लिया कि घर का क्या होगा? बच्चों की देखभाल, परिवार का ख्याल मीता के सिवा कोई नहीं रख सकता। उसने मीता से विनती की कि वो नौकरी न करे , और अपनी कही हुई बात के लिए शर्मिंदा होते हुए माफी माँगी। अब जाके मीता को आराम मिला। मिले भी क्यों न आखिर उसने अपने स्वाभिमान की रक्षा जो कर ली थी।
डॉ. आशु जैन 16/04/19
डॉ. आशु जैन 16/04/19