Tuesday, April 16, 2019

बूढ़ा बरगद

बूढ़ा/वृद्ध

वो जो हर रोज
साल की तरह
बढ़ रहा है,
जो जर्रा जर्रा
सूख के
झड़ रहा है,
धीरे धीरे
अपनी ही जड़ से
उखड़ रहा है,
वो *परिवार* का
 *बूढ़ा* बरगद
बेमौत थोड़ा थोड़ा
मर रहा है।
जिसकी छाया में
हर शाख पली
जिसके आगे
आँधियों की
एक न चली
अब वो खुद
अपनी ही
हवाओं में
उलझ रहा है,
वो परिवार का
बूढ़ा बरगद
बेमौत थोड़ा थोड़ा
मर रहा है।
जिसकी जड़ें
बहुत गहराई में
समाई हैं
गमों के तूफानों ने भी
जिससे मात खाई है
आज वो अपनों की
अनदेखी से गुजर रहा है
वो परिवार का
बूढ़ा बरगद
बेमौत थोड़ा थोड़ा
मर रहा है।
डॉ. आशु जैन 10/04/19

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