Tuesday, April 16, 2019

जीवन की पहली गुरु- माँ

माँ का थप्पड़
वैसे तो ये बात जग जाहिर है कि पहली गुरु निस्संदेह माँ होती है लेकिन मेरे मामले में ये अक्षरशः सत्य हुई। आज मैं जिस मुकाम पे हूँ वह सब केवल मेरी माँ की मेहनत और आशीर्वाद है। बात उस समय की है जब माँ बरगी के पास सहजपुरी नामक गाँव में प्राथमिक शाला में सरकारी शिक्षिका थीं और वहीं हम दोनों बहने भी पढ़ते थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद माँ का तबादला जबलपुर के तिलवारा में हो गया तो वो हम दोनों बहनों को लेकर यही आ गई और रोज का आना जाना करने लगी। हम दोनों बहनों को भी प्राइवेट स्कूल में डाल दिया। मैं 6वी कक्षा में थी, सरकारी शाला से होने के कारण अंग्रेजी 6वी से ही शुरू हुई और तबादला देर से होने के कारण शाला में तिमाही परीक्षा शुरू होने को थी। हम भी बिना पढ़े पेपर देने पहुँच गए औऱ अंग्रेजी का आलम यह था कि स्वयं के नाम की भी हिज्जे नहीं आते थे। अभी कुछ ही दिन हुए थे तो ज्यादा दोस्ती भी नही हुई थी किसी से एक सूर्या नाम की लड़की से थोड़ी बहुत जान पहचान हो गई थी। उस दिन अंग्रेजी का पेपर था और नाम ही लिखते नही बन रहा तो उसी लड़की से अपने नाम की स्पेलिंग पूछ ली कर बाकी पेपर खाली छोड़ दिया। घर आके बड़ी शान से माँ को बताया कि अपने नाम की स्पेलिंग अपनी नई सहेली से पूछी थी तो माँ ने उल्टे गाल पे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मारा जिसकी सनसनाहट आज भी महसूस कर सकती हूँ मैं। मेरी याददाश्त के हिसाब से वो मेरे जीवन का पहला और आखिरी थप्पड़ होगा लेकिन उसके बाद से मेरा जीवन ही बदल गया। मुझे अंग्रेजी सीखने की सनक पैदा हो गई और इतनी ज्यादा बढ़ गई कि मैं उसी कक्षा की अंग्रेजी में सबसे ज्यादा होशियार छात्रा मानी जाने लगी। पिछले 10 वर्षों से जबलपुर शहर के प्रतिष्ठित महाविद्यालय में व्याख्याता वाणिज्य के पद पर हूँ और दो वर्ष पहले ही विभागाध्यक्ष बनाई गई हूँ। आज मुझे यहाँ उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है कि हिंदी माध्यम से होने के बाद भी अंग्रेजी में कक्षाएं लेती हूँ इसका सारा श्रेय केवल मेरी माँ को जाता है।

डॉ. आशु जैन 11/04/19

इसका अर्थ यह नहीं कि अंग्रेजी मेरे लिए गर्व का विषय है, मेरा पहला प्यार हिंदी है लेकिन अंग्रेजी मेरे जीवनयापन का जरिया और मेरे करियर का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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