सोचा आज खुद से खुद की मुलाकात करूँ
अकेली बैठी हूँ दर्पण से ही थोड़ी बात करूँ।
पूछा मैने उससे बड़े ही सम्मान से
बताओ कैसी लग रही हूँ, थोड़े अभिमान से
थोड़ा सकुचाते हुए बोला मुझसे दर्पण
लग रही हो सुंदर पर कल से थोड़ी सी कम,
आश्चर्य से मैने पूछा, एक दिन में क्या घटा!
बोला एक-एक करके एक पूरा दिन घटा।
मैं भी कुछ देर के लिए सोच में पड़ गई
बात तो सीधी कही सीधे दिल में उतर गई
हर पल हर क्षण ढल रहा है इंसान
फिर किस बात का है इतना अभिमान?
क्यों है बेवजह बैर, लड़ाई और नफरत
क्यों दूसरों को छलने हो रही दिमागी कसरत?
क्यों लगे हुए हैं हम खुद को बनाने में महान?
क्यों नहीं समझता कि हर पल ढल रहा है इंसान?
दर्पण के सामने बैठकर खुद से एक वादा किया
बहुत जिया खुद के लिए अब मदद का इरादा किया
नही शामिल होना अब किसी भी होड़ में
दूसरों को नीचा दिखाने वाली किसी भी दौड़ में।
अब अपने हर पल का सही इस्तेमाल करना है
खुद को प्यार करना है दूसरों की सँभाल करना है
दिल से मिटाने है हर दर्द जो सबने दिए
माँगनी है क्षमा जो मेरे कारण कभी रो दिए
हर पल मुस्कुराने की आदत डाल लूँगी
जो कहे कोई बुरा मुझे तो हँसकर टाल दूँगी।
उठते-उठते मैंने एक बार फिर दर्पण को देखा
उसकी आंखों में थी सम्मान की एक रेखा
आँखों में अपनी चमक को संभाले हुए
निकल पड़ी पूरे करने खुद से जो वादे किया।
डॉ. आशु जैन 16/09/19
No comments:
Post a Comment