Thursday, November 1, 2018

सूना - सूना:


रोती , बिलखती, दशरथ की अँखियाँ,
पूछ रही हैं कैकेयी से अनेकों सवाल,
जिसने कदम नही रखा जमी पे,
जंगलों में भटका है क्यों मेरा लाल?
देवी सी , नाजुक सी, कोमल वो नार,
कैसे सहेगी जंगल और भयावह पहाड़?
छोटा सा, नटखट , वो भाई का प्यारा,
कैसे बनेगा अपने अग्रज का सहारा?
मेरी थी भूल जो दिया तुझे वचन,
मेरे सपूत भटक रहे हैं वन वन
सूनी अयोध्या है सूना है घर द्वार
 *सूना-सूना* लागे है मुझे सारा संसार
कर जोड़ूँ कैकेयी विनती करूँ तेरी
दे दे मुझे प्राणों से प्यारी संताने मेरी।
बुला उन्हें वापस और न जाने की ले कसम
उनके बिना निकल रहे हैं प्राण मेरे हर दम।
भूल रहे है राजा जी रघुकुल की रीत
मोहपाश में घेरे है उन्हें राम की प्रीत।
वचन लिया है राम ने तो पूरा निभाएंगे
प्राण से चाहे चले जाएं पर वचन से नही जाएंगे।
डॉ. आशु जैन 28/10/18

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