शख्सियत एक, रूप अनेक
माँ तू सबसे निराली है,
तेरे संग ही होली मेरी,
संग तेरे ही दीवाली है।
बस दो आंखे हैं माँ तेरी,
लेकिन संसार बसा इनमें
पाँव तेरे हैं मेरा बसेरा,
मेरा स्वर्ग बसा जिनमें।
दिल भी तेरा बस एक ही है माँ,
कितना प्यार लुटाती हो,
सौ जन्मों तक चुका न पाऊँ,
ये *ममता* कहाँ से लाती हो?
हाथ भी तेरे दो ही हैं माँ,
कितना बोझ उठाती हो,
देवी माँ के आठ हाथ है
तुम दो से सब कर जाती हो।
धरती जैसी सहन शक्ति माँ,
नदिया जैसी निश्छल हो,
जब भी लूँ मै सांस आखिरी,
हाथ में तेरा आँचल हो माँ
हाथ में तेरा आँचल हो।
डॉ. आशु जैन 29/10/18
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