Thursday, November 1, 2018

काजल


आज फिर उसने आंखों में काजल लगाया
सूजी हुई आंखों को बखूबी छुपाया,
लगाई फिर उसने अपने होंठो पे लाली,
अपनी बदकिस्मती कुछ ऐसे छिपाली,
गालों पर अपने थोड़ा पाउडर भी मला,
ऐसे ही तो रोज उसका जीवन चला,
फिर उसने  हाथों में मेहंदी रचाई,
'नील' को 'लाल' से ढकने की कला है पाई
और अंत में उसने लपेटी रेशमी साड़ी,
यूँ ही चला ली अपनी गृहस्थी की गाड़ी,
सर से पाँव तक उसने कर लिया श्रृंगार,
मुस्कुरा कर उसने इसी तरह जख्म छिपाये हर बार।
डॉ. आशु जैन 26/10/18

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