Friday, November 23, 2018

दीप/ दिया:


पहला दिया जलाया मैंने आज अपनी जुबान पर
कभी किसी का दिल न दुखाऊँ अनजाने या जानकर
दूजा दिया जलाया मैने अपनी दोनों आंखों पर
आये कभी न ईर्ष्या द्वेष मुझे किसी की बातों पर
तीजा दिया जलाया मैंने अपने दोनों हाथों पर
करूँ प्रेम से सेवा सबकी बढ़ूँ आगे दृण निश्चय कर
चौथा दिया जलाया मैने अपने दोनों पैरों पर
न भागूँ कभी अकेले किसी को मुश्किल में यूँ छोड़कर
अंतिम दिया जलाया मैंने अपने हृदय के अंतस पर
त्यागूं अभिमान छोड़ूँ लोभ रखूं मोह को दूर पर
पांच दिये जलाकर मैने अपनी दीवाली मनाई
मैने तो प्रण ले लिए अब आपकी बारी आई।
डॉ. आशु जैन 5/11/18

No comments:

Post a Comment

स्वाभिमान - लघुकथा

मन बड़ा आहत है जब से मीता ने रमेश को कहते सुना अरे मेरी बीवी किसी काम की नहीं। बस खाना बनाती है और सारा दिन पड़ी रहती है। पढ़ी लिखी है लेकिन न...