जब लड़खड़ाते
जज्बातों से
टूटते हुए
अल्फाज़ो से
तुमने अपने प्यार का
वास्ता देकर
मेरा रास्ता रोका था
मैं चाहकर भी
नही रोक पाई
खुद को
न जाने से
साल दर साल
गुजरते हुए लम्हो में
हर सोच में
हर अक्षर में
आज भी तुम हो
तुम्हारे
टूटे हुए अल्फाज हैं
जिनको जोड़कर
मैं बना लेती हूँ
अपने वाक्य
अपनी रचनाएँ
और हर रचना का
केंद्र होते हो
सिर्फ तुम।
डॉ आशु जैन 'अश्क'
जज्बातों से
टूटते हुए
अल्फाज़ो से
तुमने अपने प्यार का
वास्ता देकर
मेरा रास्ता रोका था
मैं चाहकर भी
नही रोक पाई
खुद को
न जाने से
साल दर साल
गुजरते हुए लम्हो में
हर सोच में
हर अक्षर में
आज भी तुम हो
तुम्हारे
टूटे हुए अल्फाज हैं
जिनको जोड़कर
मैं बना लेती हूँ
अपने वाक्य
अपनी रचनाएँ
और हर रचना का
केंद्र होते हो
सिर्फ तुम।
डॉ आशु जैन 'अश्क'
nice
ReplyDeleteThnx bro
DeleteThnx bro
Deleteसुंदर
ReplyDeleteधन्यवाद सर
Deleteधन्यवाद सर
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