Saturday, October 19, 2019

मत लांघो मर्यादा

मत लांघो तुम मर्यादा
द्वार खड़ा कोई रावण है
राम बने फिरते जो जग में
मनमें छिपा दशानन है।
मुख से फूल ही फूल झरें
बात करें तो लार गिरे
मत आना उनकी बातो में
यह सब चाल ठगावन है
राम बने फिरते जो जग में
मनमें छिपा दशानन है।
सहयोग करन का स्वांग रचे
मौका मिलते हाथ धरें
मत देना तुम उनको मौका
नियत में खोट खोटावन है
राम बने फिरते जो जग में
मनमें छिपा दशानन है।
पहले जीते वो विश्वास
फिर प्रतिउत्तर की हो आस
दे न सको तुम जो प्रतिउत्तर
करते कर्म घिनावन हैं
राम बने फिरते जो जग में
मनमें छिपा दशानन है।

स्वाभिमान - लघुकथा

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